राजस्थान में सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती परीक्षा को लेकर चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा मात्र 24 घंटे के भीतर अपने ही फैसले को पलटने से प्रदेश के लाखों बेरोजगार अभ्यर्थियों में निराशा और अविश्वास का माहौल है. इस फैसले के बाद भजनलाल शर्मा सरकार की कार्यप्रणाली और एसओजी (SOG) की जांच की सुस्त रफ्तार पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
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क्या है पूरा मामला?
दरअसल, साल 2021 की सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को एकल पीठ द्वारा निरस्त किए जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था.
- पहला फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि 2021 की परीक्षा में शामिल अभ्यर्थी 2025 की आगामी एसआई भर्ती परीक्षा में बैठने के पात्र होंगे. इससे करीब ढाई लाख अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी थी.
- 24 घंटे में यू-टर्न: अगले ही दिन कोर्ट ने अपने फैसले को बदलते हुए स्पष्ट किया कि राहत केवल उसी व्यक्ति को मिलेगी जो कोर्ट पहुंचा है. कोर्ट ने दलील दी कि वकील साहब बाकी ढाई लाख अभ्यर्थियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं.
भजनलाल सरकार पर उठते सवाल
भजनलाल सरकार ने कोर्ट में आंकड़े देते हुए बताया कि यदि 2021 के सभी अभ्यर्थियों को अनुमति दी गई, तो ढाई लाख अतिरिक्त परीक्षार्थी शामिल होंगे, जिससे परीक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि सरकार बेरोजगारों के हितों को लेकर वैसी तत्परता नहीं दिखा रही है जैसी उसे दिखानी चाहिए थी.
SOG की जांच और 'डमी' का खेल
वीडियो रिपोर्ट में एसओजी की जांच पर भी तीखा कटाक्ष किया गया है. आरोप है कि पेपर लीक की मुख्य जांच अब 'पुरानी बात' हो गई है. अब केवल डमी अभ्यर्थियों और फर्जी सर्टिफिकेट्स को पकड़कर खानापूर्ति की जा रही है. बाबूलाल कटारा और शिव सिंह राठौर जैसे मुख्य किरदारों से पूछताछ न होना सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है.
मुख्यमंत्री खुद उठा रहे हैं 181 के फोन कॉल्स
एक तरफ जहां बड़े नीतिगत फैसलों और भर्ती विवादों पर संशय है, वहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा खुद 181 हेल्पलाइन पर जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र और बिजली-पानी जैसी छोटी शिकायतों को सुन रहे हैं. हालांकि यह जनसुनवाई की अच्छी पहल है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रदेश के बड़े अधिकारी अपना काम ठीक से नहीं कर रहे जो मुख्यमंत्री को सफाई और प्रमाण पत्र जैसे मसलों में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है?
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