Rajasthan Panchayat election: राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक वरिष्ठ नेता का दर्द और उनका पूछा गया सवाल तेजी से चर्चा बटोर रहा है. कभी सूबे की सियासत में अपनी बात मजबूती से रखने वाले और दूसरों के राजनीतिक सफर का फैसला करने वाले पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ आज अपनों के सियासी भविष्य को लेकर परेशान दिख रहे हैं. पंचायत चुनाव के टिकट मंथन के दौरान उठी एक आवाज ने भारतीय जनता पार्टी के भीतर की हलचल को बढ़ा दिया है. क्या है पूरा मामला और कौन हैं राजेंद्र राठौड़ चलिए विस्तार से जानते हैं इस खबर में...
ADVERTISEMENT
'मुझसे ही क्या समस्या है?' बैठक में छलका वरिष्ठ नेता का दर्द
मिली जानकारी के अनुसार राजस्थान पंचायत चुनाव के लिए चूरू जिला परिषद के टिकटों को लेकर बीजेपी की बैठक चल रही थी. दावा है कि इस दौरान राजेंद्र राठौड़ अपने बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ और बहू कनिका सिंह के लिए उम्मीदवारी चाहते थे. रिपोर्ट्स के अनुसार, जब बैठक में बहू का नाम तय करने और बेटे का टिकट होल्ड पर रखने की बात आई तो राठौड़ का सब्र टूट गया. उन्होंने सीधा सवाल दागा कि आखिर उनके बेटे का टिकट बार-बार क्यों रोका जा रहा है? उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के चुनाव में भी उनके बेटे का नाम होल्ड पर रखा गया था. जब एक-एक परिवार में कई-कई टिकट दिए गए हैं तो सिर्फ उनसे ही संगठन को क्या दिक्कत है?
बैठक छोड़ने की नौबत और मुख्यमंत्री का आश्वासन
बात इतनी बढ़ गई कि नाराजगी में राजेंद्र राठौड़ बैठक छोड़कर जाने की स्थिति में आ गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने मोर्चा संभाला और उन्हें शांत कराया. मुख्यमंत्री ने राठौड़ को भरोसा दिलाया कि वह पार्टी के बेहद अनुभवी व वरिष्ठ नेता हैं और उनकी राय का पूरा मान-सम्मान रखा जाएगा. हालांकि, इस घटनाक्रम के बाद से ही सूबे में उनके राजनीतिक रसूख को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं.
RCA चुनाव से शुरू हुई थी बेटे के सियासी सफर में अड़चन
अगर इस पूरे विवाद की कड़ियों को जोड़ें तो इसकी शुरुआत सितंबर 2026 में हुई थी. उस दौरान राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के चुनाव में पराक्रम सिंह राठौड़ का नाम रेस में शामिल था. मगर ऐन वक्त पर उन्हें अपना नामांकन वापस लेना पड़ा था. तब भी उनके सियासी भविष्य पर सवाल उठे थे और अब पंचायत चुनाव में भी वही स्थिति दोहराई गई. चूरू जिला परिषद के लिए बहू कनिका सिंह ने वार्ड नंबर 23 और बेटे पराक्रम सिंह ने वार्ड नंबर 39 से पर्चा भरा है. ऐसे में संगठन के सामने वरिष्ठ नेता को साधने के साथ-साथ परिवारवाद के आरोपों से बचने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है.
कौन हैं राजेंद्र राठौड़? जानें उनका राजनीतिक सफर
राजेंद्र राठौड़ की गिनती बीजेपी के उन कद्दावर चेहरों में होती है, जिन्होंने लंबे समय तक संगठन और चुनावी रणनीतियों में अपनी छाप छोड़ी है. वह सात बार विधायक रह चुके हैं और 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले तक नेता प्रतिपक्ष की बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे थे. हालांकि, 2023 के चुनाव में पार्टी ने उन्हें उनकी पारंपरिक सीट चूरू की जगह तारानगर से मैदान में उतारा, जहां उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. इस हार के बाद भजन लाल शर्मा की सरकार बनने पर भी उन्हें अब तक कोई बड़ी राजनीतिक या संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं मिल सकी है.
भविष्य की राह पर उठे कई बड़े सवाल
भले ही सत्ता में वापसी के बाद राजेंद्र राठौड़ का सियासी प्रभाव पहले जैसा न दिख रहा हो, लेकिन दूसरे राज्यों के चुनाव प्रचार में उनकी सक्रियता यह बताती है कि उनकी राजनीति खत्म नहीं हुई है. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या राजेंद्र राठौड़ पार्टी के फैसले को मानकर आगे बढ़ेंगे या उनके बेटे पराक्रम सिंह और बहू कनिका सिंह की चुनावी एंट्री परिवार के लिए राजनीति का नया रास्ता खोलेगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन उनके एक सवाल ने बीजेपी के अंदरूनी गलियारों में बहस जरूर छेड़ दी है.
ADVERTISEMENT


