राजस्थान की सियासत से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है. भरतपुर राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के साथ जारी जुबानी जंग के बीच उन्होंने यह कदम उठाया है. पार्टी द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई का फैसला लिए जाने से पहले ही उन्होंने खुद पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया.
ADVERTISEMENT
विश्वेंद्र सिंह पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर लगातार निशाना साध रहे थे. उन्होंने पार्टी के कामकाज पर भी सवाल उठाए थे. अब उन्होंने कांग्रेस से अलग होने का फैसला कर लिया है.
फेसबुक पोस्ट के जरिए कहा अलविदा
विश्वेंद्र सिंह ने अपने पोस्ट में लिखा कि वह जीवन में हमेशा अपने इष्ट गिरिराज महाराज और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर फैसला लेते रहे हैं. उन्होंने कहा कि आज कुछ छुटभैये और तथाकथित नेताओं ने उनके बारे में अनर्गल बयान दिए हैं. इससे उनके कार्यकर्ताओं में गुस्सा है. वह खुद भी इन बयानों से दुखी हैं.
उन्होंने लिखा कि उनका सार्वजनिक जीवन हमेशा बेदाग और खुली किताब की तरह रहा है. वे अपने उसूलों और आदर्शों से कभी कोई समझौता नहीं कर सकते. पार्टी में चल रही चापलूसी की परंपरा और चाटुकार नेताओं के अनर्गल बयानों से उनका मन बहुत दुखी है. उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में दम घुटने से मरने के बजाय स्वाभिमान के साथ राहें जुदा कर लेना बेहतर है. वे पार्टी की गलत नीतियों और फैसलों के साथ अब आगे नहीं चल पाएंगे.
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत 30 सितंबर को हुई थी. विश्वेंद्र सिंह ने फेसबुक पोस्ट के जरिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर गंभीर आरोप लगाए थे. उन्होंने भरतपुर और डीग जिले के नगर निकाय चुनावों में कांग्रेस के बंटाधार के लिए सीधे तौर पर दोनों जिलाध्यक्षों और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को जिम्मेदार ठहराया था.
उन्होंने आरोप लगाया था कि दोनों जिलाध्यक्षों ने असली निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार करके केवल अपने चहेतों को चुनाव में टिकट बांटे, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा और जनता ने उन्हें सबक सिखा दिया. उन्होंने यह भी कहा था कि यह क्षेत्र मुख्यमंत्री का गृह जिला है, जहां पार्टी मजबूत होनी चाहिए थी, लेकिन इन नेताओं ने पार्टी को डुबोने का काम किया. विश्वेंद्र सिंह ने डोटासरा पर मूक-बधिर बनकर बैठने का आरोप लगाते हुए कहा था कि जब तक ऐसे लोग कुर्सी पर बैठे हैं, तब तक कांग्रेस का उठना पूरी तरह नामुमकिन है.
डोटासर पर लगाए थे कई आरोप
इसके बाद अपनी दूसरी पोस्ट में विश्वेंद्र सिंह ने गोविंद सिंह डोटासरा पर भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के बेहद संगीन आरोप लगाए थे. उन्होंने खुलासा करते हुए लिखा कि वर्ष 2018 की भर्ती और 2016 के आरएएस चयन प्रक्रिया में डोटासरा की पुत्रवधू प्रतिभा पूनिया, पुत्रवधू के भाई गौरव पूनिया और बहिन प्रज्ञा पूनिया सभी को इंटरव्यू में बराबर 80-80 अंक दिए गए. प्रतिभा पूनिया का चयन आरएएस-2016 में हुआ, जबकि गौरव और प्रज्ञा का चयन 2018 में हुआ. विश्वेंद्र सिंह ने सवाल उठाया कि सभी रिश्तेदारों के एक समान अंक आना गंभीर संदेह पैदा करता है. इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि डोटासरा के पुत्र अविनाश सिंह का 2016 में आरएएस में चयन कराने के लिए नॉन-क्रीमी लेयर का ओबीसी प्रमाण पत्र बनवाकर अनुचित लाभ लिया गया, जबकि उनके समधी क्रीमी लेयर में आते थे.
विश्वेंद्र सिंह ने डोटासरा के शिक्षा मंत्री रहते हुए रीट परीक्षा में बड़ी धांधली का भी मुद्दा उठाया और कहा कि इससे गरीब किसानों के मेहनती बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया गया. उन्होंने मौजूदा सरकार से इन मामलों की गहन जांच की मांग की थी. इसके अलावा, बयाना में स्वर्गीय बृजेंद्र सूपा की मूर्ति अनावरण कार्यक्रम के दौरान डोटासरा द्वारा भरतपुर की जनता के बारे में दिए गए विवादित बयान का जिक्र करते हुए विश्वेंद्र सिंह ने कहा था कि डोटासरा ने भरतपुर के लोगों का अपमान किया है और अगली बार जब वे भरतपुर आएंगे तो उनका ऐसा स्वागत किया जाएगा जिसे वे याद रखेंगे. उन्होंने स्पष्ट मांग की थी कि ऐसे भ्रष्ट नेताओं को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए या आलाकमान को इन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए.
38 साल से राजनीतिक क्षेत्र में विश्वेंद्र सिंह
विश्वेंद्र सिंह के राजनीतिक करियर की बात करें तो वे पिछले 38 सालों से चुनावी राजनीति में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1988 में कांग्रेस से भरतपुर के जिला प्रमुख बनकर की थी. इसके बाद 1989 में वे जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार सांसद बने. 1993 में वे फिर से कांग्रेस में शामिल हुए और नदबई से विधायक चुने गए. इसके बाद 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर भरतपुर से दो बार सांसद चुने गए. वे 2003 से 2008 तक तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक सलाहकार भी रहे. बाद में वे दोबारा कांग्रेस में लौट आए और 2013 तथा 2018 में डीग-कुम्हेर सीट से लगातार विधायक बने. अशोक गहलोत सरकार में वे पर्यटन मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. वर्ष 2020 में सचिन पायलट खेमे की बगावत के दौरान मानेसर जाने के कारण उन्हें मंत्री पद से हटाया गया था, हालांकि बाद में उन्हें फिर से मंत्री बना दिया गया था. वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें डीग-कुम्हेर सीट से हार का सामना करना पड़ा था.
ADVERTISEMENT


