Rajasthan Politics: राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार को उदयपुर के आदिवासी इलाकों में अपना 72वां जन्मदिन मनाया. इस दौरान उन्होंने आदिवासी छात्रों के साथ बातचीत की, उनके साथ खाना खाया, उनकी समस्याएं सुनीं और पूरी एक रात वहीं बिताई. इस कार्यक्रम के पीछे कांग्रेस पार्टी का खास मिशन है. इसलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आदिवासी इलाके में सीएम गहलोत के जन्मदिन मनाने के पीछे क्या सियासी मायने हैं?
ADVERTISEMENT
राजस्थान में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने अपने पारंपरिक वोट बैंक दलितों और आदिवासियों की ओर रुख किया है. इसके लिए कांग्रेस ने राजस्थान में मिशन-59 लॉन्च किया है. इसके तहत राजस्थान में कांग्रेस 59 दलित और आदिवासी सीटों पर सबसे ज्यादा फोकस करना चाहती है. इस वोट बैंक में पकड़ बनाने के लिए कांग्रेस में सीएम गहलोत से बड़ा चेहरा भला कौन हो सकता है.
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि मिशन-59 का मुख्य उद्देश्य राजस्थान में एससी-एसटी आरक्षित सीटों पर कांग्रेस को मजबूत करना है. कांग्रेस इन सीटों के लिए एक नया नेतृत्व विकसित करने की तैयारी कर रही है. यही कारण है कि कांग्रेस ने इस तरह का प्रयोग किया है. राजस्थान में पहली बार एससी-एसटी विधानसभा सीटों पर गैर-एससी-एसटी विधानसभा समन्वयक नियुक्त किए गए हैं. ये समन्वयक सभी 34 एससी सीटों पर नियुक्त किए गए हैं जबकि एसटी सीटों पर इनकी नियुक्ति बाकी है.
भीलवाड़ा के राजनीतिक विश्लेषक राकेश शर्मा ने कहा, “आजादी के बाद, ब्राह्मण एकतरफा कांग्रेस को वोट देते थे. लगभग एक दशक के बाद, कांग्रेस ने जाटों की तरफ रुख किया और वे भी पूरी तरह से कांग्रेस की ओर हो गए. लेकिन कुछ सालों के बाद कांग्रेस को लगा कि अब उसे अन्य समुदायों की ओर बढ़ना होगा जिसके बाद कांग्रेस ने दलित-आदिवासी-मुस्लिम और ओबीसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया. इस फॉर्मूले से सबसे बड़ा वर्ग जो कांग्रेस के साथ दृढ़ता से जुड़ा था, वह दलित और आदिवासी वर्ग था.”
राकेश शर्मा ने कहा कि आदिवासी लंबे समय तक कांग्रेस का समर्थन करते रहे लेकिन समय के साथ भाजपा और भारतीय ट्राइबल पार्टी समेत कई अन्य दलों ने इस वोटबैंक को तोड़ लिया. कांग्रेस अब इस वोट बैंक को वापस पाना चाहती है.
पिछले चुनावों में ऐसा रहा कांग्रेस का हाल
राजस्थान में 34 एससी और 25 आदिवासी सीटें हैं. पिछले तीन चुनावों का गणित देखें तो तीन कार्यकाल में दो कांग्रेस के रहे हैं. इसके बावजूद पिछले तीन चुनावों में बीजेपी ने इन कैटेगरी में अच्छी खासी सीटें जीती हैं. विपक्ष में रहने के बावजूद बीजेपी एससी सीटों पर आगे है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने कुल 177 दलित-आदिवासी सीटों में से 88 पर जीत हासिल की. जबकि दो बार सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस सिर्फ 69 सीटें ही जीत पाई है. बाकी सीटों पर बीटीपी और निर्दलीय सहित अन्य पार्टियों ने जीत हासिल की थी. इन एससी सीटों पर बीजेपी आगे है वहीं, कांग्रेस एसटी सीटों पर थोड़ी बढ़त ले रही है.
इस चुनाव में लड़ाई और भी दिलचस्प होगी. पहले इन सीटों पर कांग्रेस के सामने सिर्फ बीजेपी ही चुनौती हुआ करती थी. लेकिन अब कांग्रेस के लिए बीटीपी के रूप में एक नई चुनौती खड़ी हो गई है. पिछली बार बीटीपी ने 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 0.72 फीसदी वोट हासिल कर 2 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसे में इस बार माना जा रहा है कि बीटीपी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ सकती है.
बसपा बनेगी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
दलित सीटों पर कांग्रेस के लिए बसपा भी बड़ी चुनौती है. पिछले चुनाव में भी बसपा ने 6 सीटों पर जीत हासिल की थी और 4 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किया था. हालांकि बाद में कांग्रेस बसपा के सभी विधायकों को कांग्रेस में शामिल कराने में सफल रही थी. हालांकि, पिछले कुछ सालों में कांग्रेस और बसपा के रिश्तों में खटास आई है और माना जा रहा है कि आने वाले चुनावों में बसपा कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगी.
अहम सवाल यह है कि क्या मिशन 59 कांग्रेस को अपने पारंपरिक वोट बैंक का भरोसा जीतने और सरकार रिपीट करने में मदद करेगा या नहीं. या बीजेपी यहां भी नैरेटिव बदलने में कामयाब हो जाएगी. यह दोनों ही सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब केवल समय ही देगा.
ADVERTISEMENT