नीट परीक्षा और पेपर लीक के बड़े मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने के लिए बुधवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देश की शिक्षा नगरी कोटा का रुख किया है. राहुल गांधी यहां से 'छात्रों की गूंज' नामक एक नए छात्र आंदोलन की शुरुआत की. जो आने वाले दिनों में प्रयागराज, पटना और दिल्ली तक पहुंचेगा. नीट परीक्षा से ठीक चार दिन पहले हुए इस दौरे को लेकर जहां बीजेपी टाइमिंग पर सवाल उठा रही है, वहीं कांग्रेस इसे सरकार पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति मान रही है.
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'अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स' की तैयारी
राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक, राहुल गांधी पिछले कुछ हफ्तों से लगातार सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर युवाओं, सीबीएसई और नीट के छात्रों से सीधे संवाद कर रहे हैं. कांग्रेस इस आंदोलन के जरिए उस बड़े युवा वर्ग को अपने पाले में लाना चाहती है, जो मौजूदा सिस्टम और पेपर लीक की घटनाओं से बेहद परेशान और नाराज है.
राहुल गांधी खुद को पीएम नरेंद्र मोदी के विपरीत एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जो 'जेन-जी' (Gen-Z) यानी आज के युवाओं के माइंडसेट को समझता है और उनके साथ सीधा और व्यावहारिक संवाद करता है.
नीट परीक्षा से ठीक पहले क्यों पहुंचे कोटा?
राहुल गांधी के इस दौरे की टाइमिंग को लेकर बीजेपी हमलावर है कि जब छात्रों के पढ़ने का वक्त है, तब राजनीति की जा रही है. हालांकि, यह एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है. कांग्रेस का मानना है कि लोहा अभी गर्म है और परीक्षा से ठीक पहले इस मुद्दे को उठाने से सरकार बैकफुट पर रहेगी और परीक्षा के आयोजन में कोई चूक नहीं कर पाएगी. राहुल गांधी अपने राजनीतिक स्टाइल के मुताबिक किसी प्रोटोकॉल या चुनाव का इंतजार करने के बजाय सीधे छात्रों के बीच पहुंचे हैं.
राजस्थान कांग्रेस की गुटबाजी और नेतृत्व परिवर्तन के संकेत
राहुल गांधी का यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के कयास लग रहे हैं. इस दौरान प्रदेशमें राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चलने वाली अंदरूनी खींचतान एक बार फिर चर्चा में है. कोटा में राहुल गांधी की मौजूदगी के दौरान अशोक गहलोत और पायलट का आमना-सामना बेहद दिलचस्प देखने को मिला. दोनों नेताओं की मुलाकात के कई फोटो सामने आए.
चर्चा है कि पार्टी हाईकमांड अब पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में बड़े और कड़े फैसले लेने की तैयारी में है. 2028 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए हाईकमांड जल्द ही राजस्थान में लीडरशिप को लेकर स्थिति साफ कर सकता है, जहां सचिन पायलट के धैर्य की लगातार परीक्षा हो रही है.
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