अजय राय पिंडरा विधानसभा से ही क्यों लड़ने जा रहे चुनाव? जानिए 5 बार के विधायक बनने से लेकर सीट का पूरा गणित

रोशन जायसवाल

• 04:16 PM • 03 Sep 2026

Ajay Rai Pindra Seat: यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने वाराणसी की पिंडरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. पिंडरा उनके लिए राजनीतिक होम ग्राउंड रहा है, जहां उन्होंने 7 बार चुनाव लड़कर 5 बार जीत दर्ज की. जानिए अजय राय के पिंडरा सीट चुनने की वजह, सीट का जातीय समीकरण, अब तक का चुनावी इतिहास और उनके पूरे राजनीतिक सफर की कहानी.

Ajay Rai Pindra Seat
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यूपी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राज्य का सियासी पारा काफी हाई है. चुनाव को लेकर सारी पार्टियां अपने-अपने स्तर पर तैयारियों में जुट गई है. इसी बीच कांग्रेस खेमे से बड़ी खबर आई है. यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और कद्दावर नेता अजय राय ने वाराणसी की पिंडरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है, जिसके बाद पूर्वांचल की राजनीति गरमा गई है. अजय राय के इस ऐलान के बाद यह सीट चर्चित सीटों में से एक बन गई है. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर अजय राय ने पिंडरा सीट को ही क्यों चुना? क्या है इस सीट का समीकरण? आइए विस्तार से जानते हैं इन्हीं सवालों के जवाब और अजय राय का पूरा राजनीतिक करियर.

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अजय राय के लिए क्यों खास है पिंडरा सीट?

यूपी कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष अजय राय के लिए पिंडरा विधानसभा सीट महज एक चुनावी मैदान ही नहीं, बल्कि उनका राजनीतिक 'होम ग्राउंड' है. उन्होंने इसी सीट से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी और विपरित परिस्थितियों में भी अपनी पकड़ साबित की है. 

अजय राय ने पिंडरा(पूर्व में कोलअसला) सीट से कुल 7 बार विधानसभा चुनाव लड़ा है, जिसमें उन्होंने 5 बार चुनाव जीता है. साल 1996 में उन्होंने पहली बार चुनाव जीता, फिर 2002 और 2007 में लगातार भाजपा उम्मीदवार के तौर पर जीत सुनिश्चित की. साल 2009 के उप-चुनाव में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और अपना वर्चस्व कायम रखते हुए सीट जीत गए. फिर साल 2012 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और फिर से यहां से विधायक बन गए. हालांकि 2017 और 2022 के चुनाव में उन्हें बीजेपी उम्मीदवार डॉ. अवधेश सिंह से हार का सामना करना पड़ा था.

अजय राय के जीत और हार, दोनों के पीछे की वजह?

अजय राय के राजनीतिक सफर को देखे तो लगातार 5 बार के विधायक बने अजय राय लगातार पिछले 2 विधानसभा चुनाव में हार रहे है. 

जीत: अजय राय के लगातार जीत के पीछे की वजह उनका मजबूत ग्राउंड कनेक्ट, स्थानीय जनसंपर्क, जमीनी कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और क्षेत्र में उनकी बोल्ड छवि बताया जाता है.

हार: वहीं 2017 में भाजपा की लहर, हिंदू वोटर्स का एकीकरण और BSP के मजबूत प्रत्याशी के मैदान उतरते ही वोटों के बिखराव की वजह उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. 2022 में मोदी-योगी फैक्टर और भाजपा के कैडर वोट बैंक के लामबंद होने के कारण अजय राय इस सीट पर नहीं जीत पाए थे.

पिंडरा सीट का समीकरण

पिंडरा विधानसभा सीट के समीकरण की बात करें तो यहां कुल 3 लाख 73 हजार 808 मतदाता है. इनमें लगभग 2 लाख पुरुष मतदाता और 1.73 महिला मतदाता है. अगर जातिगत समीकरण को देखें तो इस सीट का राजनीतिक गणित कुर्मी और पटेल वोटर्स के आस-पास घूमता है, क्योंकि यहां लगभग 80 हजार के ज्यादा कुर्मी/पटेल वोटर्स है जो किसी भी चुनाव का रुख मोड़ने की क्षमता रखते है.

वहीं दूसरे पायदान पर दलित(अनुसूचित जाति) 65 से 70 हजार मतदाताओं के साथ है. वहीं ब्राह्मण और भूमिहार जाति की कुल संख्या करीबन 60 हजार है. अजय राय खुद भूमिहार समुदाय से आते है. इसके अलावा यादव के 35-40 हजार और मुस्लिम के लगभग 25 हजार मतदाता है. साथ ही कुशवाहा मतदाता भी यहां निर्णायक भूमिका ने नजर आते है. 

पिंडरा सीट पर कब किसका रहा दबदबा?

पिंडरा विधानसभा सीट का नाम पहले 'कोलअसला'था. हालांकि 2008 के परिसीमन के बाद यह पिंडरा विधानसभा सीट हो गया है. कहा जाता है पिंडरा के इतिहास भारतीय राजनीति के बड़े बदलावों का गवाह रहा है.

  • ​वामपंथ का गढ़ (1962-1993): एक समय यह सीट कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की लाल क्रांति का गढ़ मानी जाती थी. दिग्गज कम्युनिस्ट नेता उदल ने यहां से रिकॉर्ड 9 बार विधायक बनकर इतिहास रचा था.
  • अजय राय का युग (1996-2012): 1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर उतरे अजय राय ने उदल को हराकर वामपंथ के किले को ध्वस्त कर दिया. इसके बाद 2012 तक पार्टी बदलने के बावजूद (भाजपा, निर्दलीय, कांग्रेस) सीट अजय राय के पास ही रही.
  • ​भाजपा की वापसी (2017-वर्तमान): 2017 और 2022 के चुनावों में भाजपा के डॉ. अवधेश सिंह ने जीत हासिल कर यहां कमल खिलाया.

अजय राय का राजनीतिक सफर

अजय राय का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है. उन्होंने अपनी राजनीतिक जीवन की शुरुआत भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(ABVP) से की थी. साल 1996 में पिंडरा(तब का कोलअसला) से पहली बार उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद वे लगातार चुनाव जीते और 2007 तक भाजपा विधायक बने रहें. जब साल 2009 में वाराणसी लोकसभा सीट से भाजपा ने मुरली मनोहर जोशी को उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने पार्टी से बगावत कर ली. तब अजय राय ने समाजवादी पार्टी का दामन थामा, लेकिन वे लोकसभा चुनाव हार गए. हालांकि जब पिंडरा(तब का कोलअसला) पर उप-चुनाव हुए तो उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर जीता.

2012 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और फिर से विधायक बने. कांग्रेस ने उन्हें 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी लोकसभा सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतारा लेकिन वो चुनाव हार गए. हालांकि जुझारू तेवर और जमीनी संघर्ष को देखते हुए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया है.

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