इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्कूलों में हिजाब की अनुमति नहीं देने वाले फैसले पर भड़के मौलाना यासूब अब्बास, जानें क्या कहा

न्यूज तक डेस्क

• 01:27 PM • 25 Aug 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूलों में समानता और अनुशासन का हवाला देते हुए ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनने की याचिका खारिज कर दी है. वहीं, शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास ने इसे मजहबी आजादी पर चोट बताते हुए अदालत से अपने फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है.

मौलाना यासूब अब्बास
मौलाना यासूब अब्बास
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स्कूलों में ड्रेस कोड लागू रहेगा या मजहबी आजादी के तहत हिजाब की इजाजत मिलेगी? इस सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम रुख अपनाया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि शिक्षण संस्थानों में यूनिफॉर्म के नियमों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट के मुताबिक, स्कूलों में एक जैसी ड्रेस से ही बच्चों के बीच समानता की भावना मजबूत होती है और संस्थान का अनुशासन बना रहता है.

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अनुशासन और समानता सबसे ऊपर

फैसले में अदालत ने माना कि स्कूल की अपनी एक अलग पहचान होती है, जिसे बनाए रखने के लिए यूनिफॉर्म का पालन बेहद जरूरी है. क्लासरूम के भीतर सभी छात्र-छात्राएं एक समान नजर आएं, इसीलिए ड्रेस कोड के नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए.

मौलाना यासूब अब्बास की प्रतिक्रिया

हाईकोर्ट का आदेश सामने आते ही इस पर बहस छिड़ गई है. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने इस फैसले पर कड़ा एतराज जताते हुए अदालत से पुनर्विचार की अपील की है.

मौलाना यासूब अब्बास ने अपने बयान में कहा:

भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी और यहूदी- सभी को अपने धर्म का पालन करने की संवैधानिक आजादी मिली हुई है. छोटी बच्चियों के हिजाब पर पाबंदी लगाना सही नहीं है. अगर कोई छात्रा स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी अपनी निजी जिंदगी के तहत हिजाब पहनकर जाना चाहती है, तो उसे रोका नहीं जाना चाहिए. अगर इस तरह पाबंदियां लगानी हैं तो फिर संविधान से धार्मिक आजादी का अधिकार ही हटा देना चाहिए. फैसले के जरिए हिजाब हटाने का दबाव बनाना गलत तरीका है.

अदालत जाने के बजाय पहनें हिजाब

मौलाना अब्बास ने मुस्लिम समुदाय को यह सलाह भी दी कि वे ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर अदालतों का रुख न करें. उन्होंने कहा कि इस्लाम में महिलाओं को जो अधिकार मिले हैं, उनके तहत वे बिना किसी झिझक के हिजाब पहन सकती हैं. हाईकोर्ट के इस फैसले और उस पर आई तीखी प्रतिक्रिया के बाद अब यह मामला एक बार फिर धार्मिक आजादी बनाम स्कूली अनुशासन की बहस के केंद्र में आ गया है.

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