वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा ने शानदार जीत दर्ज कर एक बार फिर विधान परिषद में अपनी जगह बनाई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में तीन दिनों तक चली लंबी मतगणना, सीसीटीवी कैमरों पर उठे सवालों और भारी राजनीतिक हंगामे के बीच आशुतोष सिन्हा ने भाजपा उम्मीदवार केदारनाथ सिंह को मात दी. इस रोमांचक और संघर्षपूर्ण चुनावी जीत के बाद से पूर्वांचल की राजनीति में उनकी चर्चा काफी तेज हो गई है. आइए जानते हैं छात्र राजनीति से शुरू होकर विधान परिषद तक पहुंचने वाले आशुतोष सिन्हा का पूरा सफर और कैसे वह अखिलेश यादव के खास सिपहसालारों में शुमार हुए.
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छात्र राजनीति से हुई थी राजनीतिक शुरुआत
आशुतोष सिन्हा का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था. साल 2006 में वह हरीश चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में रिकॉर्ड मतों से उपाध्यक्ष चुने गए थे. इसके बाद, साल 2007 में उन्होंने छात्र युवा सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तत्कालीन सांसद अखिलेश यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे. यहीं से उनका संपर्क पार्टी शीर्ष नेतृत्व के साथ मजबूत होना शुरू हुआ.
'अखिलेश सेना' के गठन से आए सुर्खियों में
साल 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान जब समाजवादी पार्टी के भीतर पारिवारिक और दलगत कलह का दौर चल रहा था, तब युवाओं को पार्टी से जोड़ने और अखिलेश यादव के विकास कार्यों का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए आशुतोष सिन्हा ने एक बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने वाराणसी और पूरे पूर्वांचल में 'अखिलेश सेना' नाम से एक संगठन खड़ा किया. हालांकि यह संगठन कुछ समय बाद समाप्त हो गया, लेकिन इस सक्रियता ने उन्हें अखिलेश यादव की नजरों में ला दिया और वह पार्टी नेतृत्व के बेहद करीबी बन गए.
कड़े संघर्ष और विवादों से घिरा रहा चुनाव
इस बार का स्नातक एमएलसी चुनाव कई मायनों में हाई-वोल्टेज ड्रामे से भरपूर रहा:
मतदाता सूची विवाद: साल 2025 में उन्होंने वाराणसी खंड स्नातक मतदाता सूची से अपना और अपने परिवार के सदस्यों का नाम गायब होने का आरोप लगाया था, जिसकी प्रशासनिक जांच भी कराई गई थी.
मतदान के दौरान टकराव: 23 अक्टूबर 2026 को मतदान के दिन वाराणसी सदर तहसील परिसर में भाजपा कार्यकर्ताओं और आशुतोष सिन्हा के बीच बूथ पर प्रचार को लेकर तीखी नोकझोंक और विवाद हुआ था.
स्ट्रॉन्ग रूम के कैमरे बंद होने का आरोप: पहाड़िया मंडी स्थित स्ट्रॉन्ग रूम के सीसीटीवी कैमरे लगभग 10 मिनट के लिए बंद होने और निगरानी बाधित होने का आरोप सपा प्रत्याशी ने लगाया था. हालांकि, जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह स्विच में तकनीकी खराबी और वायरिंग जलने के कारण हुआ था, जिसे तुरंत ठीक कर लिया गया था.
मतगणना के दौरान हंगामा: 28 अक्टूबर की शाम को भाजपा उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं ने मतगणना केंद्र के बाहर प्रदर्शन किया और मतगणना पर्यवेक्षक पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए. भारी हंगामे और तीन दिनों की लंबी गिनती के बाद आखिरकार आशुतोष सिन्हा ने 19,932 वोटों से रिकॉर्ड जीत अपने नाम की.
जन आंदोलनों में सक्रिय भूमिका
बसपा सरकार के कार्यकाल के दौरान भी आशुतोष सिन्हा विभिन्न जन-आंदोलनों को लेकर लगातार सड़कों पर रहे. साल 2007 और 2011 में उन्हें आंदोलनों के दौरान गिरफ्तारियां भी झेलनी पड़ीं. इसके अलावा अधिवक्ताओं के लिए चेंबर, पेंशन, आर्थिक सहायता, वित्त विहीन शिक्षकों, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों और सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली जैसे मुद्दों को लेकर वह लगातार संघर्ष करते रहे हैं.
वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर समाजवादी पार्टी की इस जीत ने पूर्वांचल में पार्टी की स्थिति को और मजबूत कर दिया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी चुनावों में यह जोड़ी सपा के लिए कितना बड़ा सियासी असर छोड़ती है.
सवाल-जवाब (FAQ)
Q1. वाराणसी एमएलसी चुनाव किसने जीता है?
: यह चुनाव समाजवादी पार्टी (SP) के प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा ने जीता है.
Q2. आशुतोष सिन्हा ने किसको हराया है?
: उन्होंने बीजेपी (BJP) उम्मीदवार केदारनाथ सिंह को हराया है.
Q3. आशुतोष सिन्हा ने कितने वोटों से जीत दर्ज की है?
: उन्होंने 19,932 वोटों के अंतर से रिकॉर्ड जीत हासिल की है.
Q4. यह चुनाव क्यों चर्चा में रहा?
: तीन दिन तक चली लंबी गिनती, सीसीटीवी कैमरे बंद होने के आरोपों और मतगणना केंद्र के बाहर हुए भारी हंगामे की वजह से यह चुनाव काफी सुर्खियों में रहा.
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