इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई इंसान सिस्टम की गंदगी साफ करने की कोशिश करता है, सिस्टम उसे निगलने की कोशिश करता है. लेकिन अलीगढ़ की मिट्टी से उपजे रिंकू सिंह राही की कहानी कुछ अलग है. यह कहानी एक ऐसे जांबाज की है जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में अपना चेहरा गंवा दिया, अपनी एक आंख की रोशनी खो दी, शरीर छलनी करवा लिया, लेकिन अपना जमीर नहीं बिकने दिया. आज जब उन्होंने आईएएस (IAS) के पद से इस्तीफा दिया है, तो लोग पूछ रहे है कि, आखिर क्यों एक ईमानदार अफसर को देनी पड़ रही है कुर्बानियां? क्या सिस्टम साफ करने के लिए मिल रही है सजा? चर्चित चेहरा के इस खास एपिसोड में जानिए आईएएस रिंकू सिंह राही की पूरी कहानी.
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बचपन से ही अन्याय के खिलाफ थे रिंकू
रिंकू सिंह राही का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था. पिता शिवदान सिंह एक छोटी सी आटा चक्की चलाते थे. घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि बड़े सपने देखे जा सकें, लेकिन रिंकू के पास मेहनत की पूंजी थी. सरकारी स्कूल की टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ने वाला यह लड़का बचपन से ही अन्याय के खिलाफ विद्रोही था. उन्होंने बीटेक किया और 2008 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UP PCS) की परीक्षा पास कर पीसीएस अधिकारी बने. उनकी पहली बड़ी पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में जिला समाज कल्याण अधिकारी के रूप में हुई. यहीं से उनके जीवन में लगातार यूटर्न आते रहे.
एक साइन और फिर चली अंधाधुंध गोलियां
मुजफ्फरनगर में चार्ज लेते ही रिंकू की नजर करोड़ों रुपये के 'वजीफा घोटाले' पर पड़ी. उन्होंने देखा कि कागजों पर फर्जी स्कूल और फर्जी छात्र खड़े करके गरीबों और पिछड़ों का करीब 83 से 100 करोड़ रुपया करप्ट सिस्टम डकार रहा है. रिंकू ने फाइलों पर कलम चला दी और भुगतान रोक दिया. करप्ट सिस्टम तिलमिला उठा. पहले रिश्वत का लालच दिया गया, फिर तबादले की धमकी मिली, लेकिन रिंकू अपनी जगह से नहीं हिले. रिंकू सिंह राही तैयार रहे होंगे कि उनसे बदला लिया जाएगा लेकिन क्या बदला ऐसा होगा?
26 मार्च 2009 को रिंकू राही सुबह बैडमिंटन खेल रहे थे. तभी अचानक बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं. रिंकू के शरीर में एक के बाद एक 7 गोलियां उतारी गईं. हमलावरों का मकसद उन्हें जान से मारना था. गोलियां उनके जबड़े को फाड़ती हुई निकल गईं, एक गोली उनके सिर में जा धंसी. चेहरा पूरी तरह क्षत-विक्षत हो गया. लेकिन मौत को शायद उस दिन हारना था. रिंकू बच गए, पर इस हमले ने उनसे उनकी दाहिनी आंख की रोशनी और एक कान से सुनने की शक्ति छीन ली.
बिना कोचिंग के UPSC की तैयारी की
हमले के बाद का संघर्ष और भी डरावना था. उन्हें पागल घोषित करने की कोशिश की गई ताकि उनकी गवाही अमान्य हो जाए. उन्हें सस्पेंड किया गया, दर-दर भटकाया गया. लेकिन रिंकू ने हार नहीं मानी. एक तरफ वे अपने ऊपर हुए हमले के मुकदमे की पैरवी कर रहे थे, दूसरी तरफ अस्पताल के चक्कर काट रहे थे और तीसरी तरफ ड्यूटी कर रहे थे. इसी बीच उन्होंने रात-रात भर जागकर यूपीएससी की तैयारी की, वो भी बिना किसी कोचिंग के.
आईएएस बनने से पहले, वे हापुड़ में आईएएस/पीसीएस की तैयारी कराने वाले सरकारी कोचिंग सेंटर (IAS/PCS Coaching Center) के प्रभारी भी रहे. वहां उन्होंने सैकड़ों गरीब बच्चों को प्रशासनिक सेवाओं के लिए तैयार किया और खुद भी पढ़ाई जारी रखी. 16 साल की सरकारी नौकरी करने के बाद 2021 में उन्होंने UPSC की सिविल सेवा परीक्षा पास करके आईएएस बनने का करिश्मा कर दिखाया.
IAS बनने के बाद भी सामने आई मुश्किलें
रिंकू का आईएएस (IAS) बनने का फैसला कोई करियर चॉइस नहीं, बल्कि एक 'बदला' था. सिस्टम से और उन लोगों से जिन्होंने उन्हें खत्म करने की कोशिश की थी. 2021 में उन्होंने वो कर दिखाया जो नामुमकिन लगता था. एक आंख, टूटा हुआ जबड़ा और सिर में फंसी एक गोली के साथ उन्होंने देश की सबसे कठिन परीक्षा UPSC पास की और 683वीं रैंक लाकर IAS बने. यह उन लोगों के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा था जिन्होंने सोचा था कि गोलियां चलाकर वे रिंकू की आवाज दबा देंगे.
आईएएस बनने के बाद भी रिंकू की राह आसान नहीं थी. हाल ही में शाहजहांपुर में एसडीएम रहते हुए उनका एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे वकीलों के सामने उठक-बैठक (Sit-ups) करते दिखे थे. दरअसल, वे भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता से इतने आहत थे कि उन्होंने विरोध का यह अनोखा तरीका चुना. इसके तुरंत बाद उनका तबादला 'राजस्व परिषद' में एक ऐसी जगह कर दिया गया जिसे प्रशासनिक भाषा में 'अटैचमेंट' या 'साइड पोस्टिंग' कहा जाता है.
क्यों दिया इस्तीफा?
31 मार्च को रिंकू सिंह राही ने ये आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया कि उन्हें लंबे समय से कोई सार्थक पद या जिम्मेदारी नहीं दी जा रही थी. उन्होंने कहा कि उन्हें 'अटैच्ड' पद पर रखा गया था, जहां उन्हें वेतन तो मिल रहा था लेकिन जनता की सेवा करने का अवसर नहीं था. उन्होंने इस स्थिति को 'भ्रष्टाचार का एक रूप' और 'नैतिक रूप से गलत' बताया. मैं सफेद हाथी बनकर नहीं रह सकता.
क्या होता है IAS अधिकारी के इस्तीफे की प्रक्रिया?
एक आईएएस अधिकारी का इस्तीफा देना और उसका स्वीकार होना एक लंबी प्रक्रिया है. आईएएस की जो नौकरी आसानी से नहीं मिले वो आसानी से जाएगी भी नहीं. सिस्टम ये है कि आईएएस अधिकारी अपना इस्तीफा राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) के जरिए केंद्र सरकार के DoPT को भेजते हैं. जब तक केंद्र सरकार इसे स्वीकार नहीं करती और अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक वे सेवा में माने जाते हैं. उनका इस्तीफा स्वीकार करने से पहले सरकार अधिकारी को मनाने या उनकी शिकायतें सुनने के लिए कंसल्टेशन सेशन कर सकती है. चूंकि रिंकू सिंह राही ने वीआरएस के पूरे साल पूरे नहीं किए हैं इसलिए उन्हें हो सकता है वीआरएस या पेंशन जैसी सुविधा न मिले.
क्या रिंकू राही का इस्तीफा स्वीकार करेगी सरकार?
सवाल मोदी सरकार से कि क्या रिंकू राही का इस्तीफा स्वीकार करेगी? या फिर एक ईमानदार छवि वाले अफसर को वापस मुख्यधारा में लाने की कोशिश होगी? रिंकू राही ने इस्तीफा देकर गेंद अब सरकार के पाले में डाल दी है. रिंकू सिंह राही ने इस्तीफा देकर खुद को 'विक्टिम नहीं बल्कि एक विनर के रूप में पेश किया है. अब देखना ये है कि सीएम योगी आदित्यनाथ इस बागी लेकिन ईमानदार अफसर को वापस काम पर लौटाते हैं या रिंकू राही यूपी की राजनीति का नया 'चेहरा' बनते हैं.
इस्तीफा देने के बाद से ही रिंकू राही के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने रिंकू राही के साहस की प्रशंसा की है. वो बीजेपी के खिलाफ चुनावों में 'भ्रष्टाचार विरोधी चेहरा' बनने के मौका बन सकते हैं. रिंकू राही जिस समाज से आते हैं और जिस तरह उन्होंने दलित छात्रवृत्ति घोटाले के लिए गोलियां खाईं, वे किसी भी पार्टी के लिए एक बहुत बड़े 'वोट बैंक' को प्रभावित करने वाले नेता साबित हो सकते हैं. रिंकू खुद कह चुके हैं कि वे 'जनता की सेवा' करना चाहते हैं. मुमकिन है कि वे सीधे राजनीति में न आकर अपना कोई सामाजिक संगठन खड़ा करें जो यूपी के युवाओं और छात्रों के लिए काम करें.
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