देश को एआई हब बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में बड़ा एआई समिट आयोजित किया. दुनियाभर की टेक कंपनियों और विशेषज्ञों ने इसमें हिस्सा लिया. मकसद था भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अग्रणी बनाना, लेकिन इस समिट में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सारी चर्चा अपनी ओर खींच ली ग्रेटर नोएडा स्थित Galgotias University का ‘रोबो डॉग’.
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क्या है पूरा विवाद?
समिट के दौरान यूनिवर्सिटी की ओर से पेश किए गए एआई इनोवेशन ओरायन नाम के रोबोट डॉग को लेकर दावा किया गया कि यह यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में विकसित किया गया है. जैसे ही यह प्रस्तुति सामने आई, सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे. कुछ लोगों ने इसे फर्जी इनोवेशन बताया और देखते ही देखते मामला ट्रोलिंग तक पहुंच गया.
विवाद तब और बढ़ गया जब यूनिवर्सिटी की ओर से सफाई जारी हुई. बयान में प्रोफेसर को 'इल-इनफॉर्म्ड' और 'अनऑथराइज्ड' बताया गया. यानी यूनिवर्सिटी ने साफ कहा कि जो दावा किया गया, वह अधिकृत जानकारी नहीं थी. हालांकि इस सफाई से मामला शांत होने के बजाय और चर्चा में आ गया. आलोचकों ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि से जोड़कर भी देखा.
कौन हैं सुनील गलगोटिया?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा यूनिवर्सिटी के फाउंडर और चेयरमैन Suneel Galgotia की हो रही है. आज जिस बड़े एजुकेशन ग्रुप का नाम देश-विदेश में लिया जाता है, उसकी शुरुआत बेहद साधारण हालात से हुई थी.
सुनील गलगोटिया का पारिवारिक बैकग्राउंड किताबों के कारोबार से जुड़ा रहा है. उनके परिवार की 1930 के दशक से दिल्ली के कनॉट प्लेस में ‘ईडी गलगोटिया एंड सन्स’ नाम से बुक स्टोर था. शुरुआती पढ़ाई उन्होंने सेंट कोलंबस स्कूल से की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया.
पढ़ाई के बाद वे पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ गए. 1980 के दशक में उन्होंने ‘गलगोटिया पब्लिकेशन’ की शुरुआत की. प्रतियोगी परीक्षाओं और विदेशी प्रकाशनों की किताबों के वितरण में उन्होंने पहचान बनाई. बताया जाता है कि शुरुआती दिनों में उन्होंने करीब 9,000 रुपये उधार लेकर अपनी पहली किताब छपवाई थी. धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता गया.
40 छात्रों से शुरू हुआ सफर
साल 2000 के आसपास उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में औपचारिक कदम रखा और 40 छात्रों के साथ गलगोटियास इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी की शुरुआत की. आगे चलकर यही पहल बड़े रूप में सामने आई और 2011 में Galgotias University की स्थापना हुई.
आज यह यूनिवर्सिटी ग्रेटर नोएडा में फैले बड़े कैंपस, हाईटेक क्लासरूम, आधुनिक लैब्स, सेंट्रल लाइब्रेरी, हॉस्टल और खेल सुविधाओं के लिए जानी जाती है. यहां इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, लॉ, मीडिया, फार्मेसी, नर्सिंग और कंप्यूटर साइंस जैसे कई प्रोफेशनल कोर्स संचालित होते हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक छोटे बुक स्टोर से शुरू हुआ यह सफर आज करीब 300 करोड़ रुपये के एजुकेशन ग्रुप में बदल चुका है. हजारों छात्र यहां पढ़ रहे हैं और बड़ी संख्या में एलुमनाई देश-विदेश में काम कर रहे हैं.
पहले भी आ चुका है नाम विवादों में
यह पहला मौका नहीं है जब गलगोटिया परिवार सुर्खियों में आया हो. साल 2014 में सुनील गलगोटिया, उनके बेटे और पत्नी को कथित 122 करोड़ रुपये की देनदारी के मामले में हिरासत में लिया गया था. हालांकि उस समय मामला ज्यादा चर्चा में नहीं आया जितना कि मौजूदा रोबो डॉग विवाद के बाद आया है.
सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़
एआई समिट में उठे विवाद के बाद सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी को लेकर मीम्स और चुटकुलों की भरमार है. छात्र भी इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. हालांकि अब तक सुनील गलगोटिया की ओर से कोई व्यक्तिगत बयान सामने नहीं आया है.
राजनीति में नई चर्चा
इसी बीच एक और चर्चा राजनीतिक गलियारों में भी चल रही है. राजस्थान की चर्चित कलाकार गौरी नागौरी ने हालिया बातचीत में राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा जताई है. उन्होंने कहा कि वे पहले आम आदमी पार्टी की स्टार प्रचारक रह चुकी हैं, लेकिन चुनाव लड़ने का इरादा नहीं था. अब वे खुलकर कह रही हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी पसंद हैं और मौका मिला तो वे बीजेपी से चुनाव लड़ना चाहेंगी. नागौर सीट को लेकर उनका नाम चर्चा में है.
एआई समिट में तकनीक से ज्यादा चर्चा एक यूनिवर्सिटी और उसके दावों की हो रही है. एक तरफ वर्षों की मेहनत से खड़ा किया गया बड़ा एजुकेशन ब्रांड है, तो दूसरी तरफ एक विवाद जिसने उसकी साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं. आने वाले दिनों में यह मामला किस दिशा में जाता है, इस पर सबकी नजर बनी हुई है.
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