Chillupar Election 2027:गोरखपुर की ब्राह्मणों के वर्चस्व वाली सीट पर सपा पलटेगी खेल? समझें पूरा समीकरण

गोरखपुर की वीआईपी चिल्लू पार विधानसभा सीट के आगामी 2027 चुनाव समीकरणों पर आधारित है, जहां करीब चार दशकों से ब्राह्मण नेतृत्व का दबदबा रहा है. इस बार मुख्य मुकाबला बीजेपी द्वारा अपनी पहली जीत को बरकरार रखने और समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा अपने 'पीडीए' फॉर्मूले से वापसी करने के बीच बेहद दिलचस्प होने वाला है.

अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ
अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. ऐसे में गोरखपुर जिले की सबसे चर्चित और वीआईपी सीटों में शुमार चिल्लू पार विधानसभा सीट (Chillupar Assembly Seat) पर अभी से राजनीतिक पारा चढ़ने लगा है. पूर्वांचल की राजनीति में यह सीट अपने ऐतिहासिक और कड़े मुकाबलों, बाहुबली सियासत और करीब चार दशकों से चले आ रहे ब्राह्मण नेतृत्व के दबदबे के लिए जानी जाती है.

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कभी यह सीट बाहुबली नेता स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी के परिवार का सबसे मजबूत गढ़ हुआ करती थी, लेकिन साल 2022 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने यहां पहली बार कमल खिलाकर इतिहास बदल दिया. अब बड़ा सवाल यह है कि साल 2027 में चिल्लू पार की सियासत किस करवट बैठेगी? क्या बीजेपी अपनी इस नई पकड़ को और मजबूत रख पाएगी या समाजवादी पार्टी (SP) इस सीट पर वापसी का रास्ता तलाश लेगी?

क्या है चिल्लू पार का राजनीतिक इतिहास?

चिल्लू पार विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है. साल 1985 से लेकर 2002 तक इस सीट पर बाहुबली नेता पंडित हरिशंकर तिवारी का एकछत्र राज और कड़ा दबदबा रहा. उन्होंने लगातार कई चुनाव जीतकर इसे अपना अभेद्य किला बना लिया था. हालांकि, साल 2007 में यहां के समीकरण बदले जब बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर राजेश त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी को पटखनी दे दी. राजेश त्रिपाठी ने इसके बाद 2012 और 2017 के चुनावों में भी अपना प्रभाव बनाए रखा. इसके बाद साल 2022 के चुनाव में राजेश त्रिपाठी ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार व हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी को हराकर पहली बार इस सीट पर बीजेपी का खाता खोला.

2027 चुनाव को लेकर बीजेपी और सपा के अपने-अपने दावे

2027 की तैयारियों के बीच दोनों ही प्रमुख दल अपनी-अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं:

बीजेपी का पक्ष: भाजपा का दावा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में चिल्लू पार में रिकॉर्ड विकास कार्य हुए हैं. सड़कों का जाल, नए पुल, 24 घंटे बिजली की उपलब्धता और बाढ़ से बचाव के लिए करोड़ों-अरबों के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है. इसके अलावा, क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के आने से रोजगार के रास्ते खुल रहे हैं. संगठन की मजबूती और विकास के दम पर बीजेपी यहां दोबारा जीत का दावा कर रही है.

सपा का पक्ष: वहीं समाजवादी पार्टी अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और मजबूत बूथ संगठन के दम पर चुनावी मैदान में उतर रही है. सपा नेताओं का मानना है कि जनता क्षेत्र में परिवर्तन चाहती है और इस बार मुकाबला काफी कड़ा होने वाला है.

क्यों 'ब्राह्मण' वोटर तय करता है जीत का रास्ता?

चिल्लू पार सीट पर सामाजिक और जातीय समीकरण हमेशा से बेहद निर्णायक रहे हैं. यही वजह है कि पिछले करीब 41 सालों से इस सीट पर लगातार ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीतता आ रहा है.

इस विधानसभा सीट के अनुमानित जातीय और सामाजिक समीकरण कुछ इस प्रकार हैं:

  • कुल मतदाता: करीब 4,31,000
  • ब्राह्मण वोटर: 1 लाख से अधिक (सबसे निर्णायक भूमिका में)
  • दलित वोटर: करीब 1 लाख
  • निषाद और ओबीसी वोटर: काफी अच्छी और निर्णायक संख्या में, जो हार-जीत तय करने की ताकत रखते हैं.

स्थानीय पत्रकारों और जनता का क्या है मूड?

गोरखपुर के स्थानीय राजनीतिक जानकारों और पत्रकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद होने के कारण विकास कार्यों (जैसे ओवरब्रिज और चमचमाती सड़कें) को नकारा नहीं जा सकता, जिससे बीजेपी को जमीन पर मजबूती मिलती है. हालांकि, कुछ स्तर पर जनता के बीच राजनीतिक उठापटक को लेकर थोड़ा असमंजस भी है. मुकाबला इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या विपक्षी दल ब्राह्मण वोटर्स और अन्य पिछड़े-दलित वर्गों के बीच बेहतर तालमेल बैठा पाते हैं या नहीं. फिलहाल दोनों ही दल इस सीट को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं.