Harish Rana Death: यह कहानी सिर्फ एक बेटे के जाने की नहीं है, बल्कि एक पिता के उस अटूट विश्वास और 13 साल लंबे इंतजार की है, जो अंततः एक चीखती हुई खामोशी में बदल गया. उत्तर प्रदेश के रहने वाले हरीश राणा, जो 2013 में एक हादसे के बाद कोमा में चले गए थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे. मंगलवार को एम्स (AIIMS) में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली.
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हादसे ने छीने थे सुनहरे सपने
साल 2013 की वह मनहूस शाम आज भी राणा परिवार के जेहन में ताजा है. एक होनहार बेटा जो इंजीनियर बनने की चाहत लेकर घर से निकला था, हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर जिंदगी और मौत के बीच झूलने लगा. सिर पर गंभीर चोट और फिर 13 साल का लंबा सन्नाटा. न कोई हलचल, न कोई आवाज; बस मशीनों की बीप और मां-बाप की धड़कनों में बसी एक उम्मीद कि शायद आज चमत्कार हो जाए.
पिता का वो सबसे कठिन फैसला
इलाज और उम्मीदों के बीच 13 साल बीत गए. पिता अशोक राणा ने हर संभव कोशिश की, लेकिन जब दर्द असहनीय हो गया और सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची, तो उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया. 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी. यह कानूनन एक आदेश था, लेकिन एक पिता के लिए अपने ही कलेजे के टुकड़े का लाइफ सपोर्ट हटाने का सबसे भारी फैसला था.
"कोई रोए ना..."
मंगलवार सुबह जब हरीश का लाइफ सपोर्ट हटाया गया, तो 13 साल से रुकी हुई सांसें हमेशा के लिए थम गईं. पिता ने भारी मन से व्हाट्सएप पर केवल एक छोटा सा मैसेज लिखा "सुबह 9:00 बजे अंतिम संस्कार, ओम शांति." श्मशान घाट पर जब हरीश का पार्थिव शरीर पहुंचा, तो पिता अशोक राणा खुद को संभालते हुए बार-बार कह रहे थे, "कोई रोए ना, मेरा बेटा अब आजाद है." लेकिन वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं. हरीश राणा चले गए, लेकिन उनकी यह कहानी देश में इच्छामृत्यु और एक पिता के असीम धैर्य पर एक बड़ी बहस छोड़ गई है.
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