करीब 13 साल तक मौत और जिंदगी के बीच झूलने वाले 32 वर्षीय हरीश राणा को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) की अनुमति मिल गई है. एम्स के पिलिएटिव केयर यूनिट में उनके जीवन रक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. लेकिन इस दर्दनाक अंत के पीछे एक छोटे भाई के त्याग और संघर्ष की ऐसी कहानी है, जिसने कलयुग में भी रामायण के 'लक्ष्मण' की याद दिला दी है.
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2013 का वो एक पल, जिसने सब कुछ बदल दिया
हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे और अपनी फिटनेस व करियर को लेकर काफी सजग थे. लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक भयावह हादसा हुआ. हरीश अपने पीजी की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए. सिर में लगी गहरी चोट ने एक हंसते-खेलते नौजवान को हमेशा के लिए बिस्तर पर समेट दिया. डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था कि उनके दिमाग की नसें सूख चुकी हैं और ठीक होने की उम्मीद न के बराबर है.
भाई आशीष का 'लक्ष्मण' जैसा त्याग
जब यह हादसा हुआ, हरीश के छोटे भाई आशीष राणा उस वक्त 12वीं की पढ़ाई कर रहे थे. पड़ोसियों के मुताबिक, आशीष ने अपने बड़े भाई की सेवा में खुद को पूरी तरह झोंक दिया. आशीष सुबह 4 बजे उठकर सबसे पहले हरीश की देखभाल करते थे, जैसे उनके डायपर बदलना, फीडिंग ट्यूब से खाना देना, बॉडी की स्पंजिंग करना और बेडशीट बदलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. इस सेवा के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, ग्रेजुएशन पूरा किया और आज गुरुग्राम की एक कंपनी में नौकरी कर रहे हैं ताकि परिवार का बोझ उठा सकें.
बेटे को बचाने के लिए पिता ने बेच दिया घर
पिता अशोक राणा ने अपने बेटे के इलाज के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. चंडीगढ़ पीजीआई से लेकर दिल्ली एम्स और कई निजी अस्पतालों के चक्कर काटे. इलाज के भारी खर्च और दवाइयों के लिए उन्होंने 2021 में अपना घर तक बेच दिया. अशोक राणा खुद बताते हैं कि हरीश को दी जाने वाली डाइट और दवाइयां बहुत महंगी थीं, लेकिन परिवार ने कभी हार नहीं मानी. करीब 13 सालों तक चले इस लंबे संघर्ष में परिवार की सारी जमापूंजी खत्म हो गई.
'यह जीव हत्या नहीं, पीड़ा से मुक्ति है'
हरीश के माता-पिता के लिए इच्छा मृत्यु की मांग करना आसान नहीं था. पिता अशोक राणा पहले इसके खिलाफ थे और इसे 'जीव हत्या' मानते थे. लेकिन हरीश के असहनीय दर्द और उसकी खत्म होती उम्मीद को देख मां ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से गुहार लगाने की बात कही. आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को हरीश के माता-पिता के धैर्य और प्रेम की सराहना करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया.
आखिरी सफर: एम्स में चल रही है प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एम्स में हरीश को एडमिट किया गया है, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उन्हें दिए जाने वाले पानी और फीडिंग ट्यूब को धीरे-धीरे बंद किया जा रहा है. अस्पताल में उनके माता-पिता के रहने की भी व्यवस्था की गई है ताकि वे अपने बेटे के इन आखिरी पलों में उसके साथ रह सकें.
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