'अब दुखी होने की बात नहीं है. अब तो मेरे बेटे की मुक्ति का समय नजदीक आ रहा है. सब शांत रहो, कोई रोएगा नहीं.' ये शब्द किसी और के नहीं बल्कि उस मां के हैं, जिसने पिछले 13 साल से अपने कलेजे के टुकड़े को बिस्तर पर एक जिंदा लाश की तरह देखा है. सुप्रीम कोर्ट से इच्छा मृत्यु पाने वाले गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी आज पूरे देश को भावुक कर रही है, लेकिन इस दर्दभरे फैसले के पीछे की कहानी और भी मार्मिक है.
ADVERTISEMENT
बीते दिनों सोशल मीडिया पर हरीश राणा का वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्हें एक दीदी सबसे माफी मांगने और सबको माफ करने की बात कह रही है. इस वीडियो में जो ब्रह्मकुमारी दीदी दिखाई दे रही है, वह ओम शांति संस्था से जुड़ी हुई है. जब हमारी टीम वहां पहुंची तो बीके लवली दीदी ने हमसे बातचीत करते हुए बताया कि उन्होंने राणा परिवार के संघर्ष को करीब से देखा है. उन्होंने बताया कि कैसे एक हंसता-खेलता परिवार 13 साल पहले एक हादसे के बाद खामोश हो गया और कैसे अब इच्छा मृत्यु के जरिए हरीश को इस पीड़ा से आजादी मिल रही है.
18 साल का साथ और वो अधूरा सपना
लवली दीदी ने बातचीत के दौरान बताया कि हरीश राणा का परिवार पिछले 18 सालों से ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ा हुआ है और वे एक परिवार की तरह है. हरीश और उसका छोटा भाई आशीष बचपन में वहां के कैंपों में जाया करते थे और वहां पर खेलकूद करते थे. हरीश एक काबिल छात्र था और सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, जब उसके साथ वो भयानक हादसा हुआ जिसने उसे पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया.
'वो कुछ कहना चाहता है': दीदी की पहली मुलाकात
लवली दीदी याद करती हैं कि 5 साल पहले जब वो पहली बार हरीश से मिलीं, तो मंजर देख उनकी रूह कांप गई. हरीश का पूरा शरीर ढका था, केवल चेहरा दिख रहा था. लवली दीदी ने कहा कि, 'उसकी आंखें खुली रहती थीं, जैसे वो किसी गहरी समाधि में हो. मैंने उसके मस्तक पर हाथ रखा और महसूस किया कि उसकी चेतना (Energy) सब कुछ सुन और समझ रही है. मुझे लगा कि उसकी आंखें कुछ कहना चाहती हैं, वो हमें अपनी ओर बुलाती थीं.'
जब मां ने पिंजरा खोलने का फैसला किया
इस कहानी का सबसे भावुक मोड़ तब आया जब 3 साल पहले हरीश की मां निर्मला ने खुद अपने बेटे की मुक्ति की बात की. दीदी बताती हैं कि मां ने हमें बुलाकर कहा, 'मैं देख चुकी हूं, अब इसे ठीक होना मुश्किल है. मैं चाहती हूं कि इसे इस कष्ट से आजाद किया जाए.' दीदी ने इस दर्दनाक परिस्थिति को समझाने के लिए कहा कि, 'अगर आपने पिंजरे में एक पक्षी पाला है, आप उससे प्यार करते हैं, लेकिन वो वहां दुखी है, तो एक दिन दया आ ही जाती है और आप पिंजरा खोल देते हैं. यह वही मां है जिसने अपने शौक या लगाव के बजाय अपने बेटे के चैन को चुना.'
भाई आशीष का त्याग और कानूनी जंग
इस 13 साल के संघर्ष में छोटे भाई आशीष ने भी जो त्याग और बलिदान दिया है वो किसी मिसाल से कम नहीं है. दीदी के मुताबिक, आशीष ने पिछले दो साल से अपनी जिंदगी के सारे सुख छोड़ दिए. हजारों मेल किए, वकीलों से मिले और सुप्रीम कोर्ट तक की दौड़ लगाई. आर्थिक तंगी और मानसिक दबाव के बावजूद पूरा परिवार एक धागे में बंधा रहा है.
'सबको माफ करते हुए जाओ': आखिरी विदाई
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में जब हरीश को तिलक लगाकर विदा किया जा रहा था, तो उसे यही समझाया गया कि यह शरीर अब एक जर्जर मकान की तरह है. दीदी ने बताया, 'हमने उससे कहा कि अब इस दुखदायी जीवन से निकलो, तुम्हारी नई मां तुम्हारा इंतजार कर रही है. सबको माफ कर दो और सबसे माफी मांगते हुए हल्के होकर जाओ.'
आज एम्स में क्या है स्थिति?
फिलहाल हरीश का परिवार एम्स (AIIMS) में है. कोर्ट के आदेश के बाद लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. पिता अशोक राणा, जो 18 साल से रोज सुबह 6 बजे की आध्यात्मिक क्लास में आते हैं, आज भी शांत हैं. मां निर्मला खुद को और पूरे परिवार को संभाल रही. उन्हें विश्वास है कि हरीश अब एक सुंदर और स्वस्थ शरीर में दोबारा जन्म लेगा.
ADVERTISEMENT


