Sikandarpur Vidhansabha 2027: क्या 2027 में ढह जाएगा सपा का किला या बीजेपी की गुटबाजी फिर बिगाड़ेगी खेल?

रजत सिंह

• 11:07 AM • 17 Jul 2026

बलिया की सिकंदरपुर विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर सपा और बीजेपी के बीच सियासी जंग तेज हो गई है. जहां मौजूदा सपा विधायक जियाउद्दीन रिजवी विकास और पीडीए समीकरण के भरोसे हैं तो वहीं बीजेपी उनकी निष्क्रियता को मुद्दा बनाकर किले में सेंध लगाने की तैयारी कर रही है.

योगी आदित्यनाथ और अखिलेश  यादव
योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है. बलिया जिले की सबसे हॉट मानी जाने वाली सिकंदरपुर विधानसभा सीट पर सियासी पारा चढ़ चुका है. इस सीट को हमेशा से समाजवादी पार्टी (सपा) का एक मजबूत अभेद्य किला माना जाता रहा है. 2017 की प्रचंड 'बीजेपी लहर' को अगर छोड़ दें, तो यहां की जनता ने ज्यादातर सपा पर ही भरोसा जताया है. फिलहाल यहां से सपा के कद्दावर नेता जियाउद्दीन रिजवी विधायक हैं, जो तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या 2027 में बीजेपी इस किले को ढहा पाएगी?

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विकास और 'पीडीए' के दम पर फिर बनेगी सरकार

मौजूदा विधायक जियाउद्दीन रिजवी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. उनका कहना है कि क्षेत्र की जनता उनके काम करने के तरीके को अच्छी तरह जानती है. रिजवी ने अपने कार्यकाल के काम गिनाते हुए कहा, जब भी इलाके में समाजवादी पार्टी का विधायक रहा, बड़े पैमाने पर विकास हुआ. हमने बालंडीनाथ जी का मंदिर, मोनिया बाबा आश्रम और खाकी बाबा के मंदिर समेत कई धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार कराया. आज की सरकार में विकास पूरी तरह ठप है. मैं रोज सुबह से लेकर आधी रात तक अपने क्षेत्र की गरीब जनता के बीच रहता हूं." रिजवी का दावा है कि इस बार भी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) का फॉर्मूला अखिलेश यादव के नेतृत्व में भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रहा है.

साढ़े चार साल घर में सोए रहे विधायक

दूसरी ओर, पिछले चुनाव में बहुत कम अंतर से रनर-अप रहे बीजेपी के पूर्व विधायक संजय यादव ने सपा पर तीखा हमला बोला है. संजय यादव का आरोप है कि चुनाव जीतने के बाद से मौजूदा विधायक पूरी तरह निष्क्रिय रहे हैं.

उन्होंने कहा, 

"लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायक की जिम्मेदारी बड़ी होती है. लेकिन पिछले साढ़े चार सालों में सपा विधायक अपने घर से बाहर नहीं निकले. जब भी जनता अपनी फरियाद लेकर उनके पास गई, तो उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि मेरी सरकार नहीं है, मेरी कोई सुनता नहीं है."

संजय यादव का दावा है कि बीजेपी सरकार में विकास के लिए फंड की कोई कमी नहीं है, बस इच्छाशक्ति की कमी सपा विधायक में थी, जिसका जवाब जनता 2027 में देगी.

किसका पलड़ा भारी?

सिकंदरपुर सीट का सियासी भविष्य हमेशा यहां के सामाजिक और जातीय ताने-बाने से तय होता है. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो:

  • इस सीट पर सबसे बड़ी आबादी दलित मतदाताओं की है जो करीब 50 हजार के आसपास है.
  • इसके बाद क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाता लगभग 30 हजार हैं.
  • यादव, राजभर और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 25-25 हजार के करीब है.
  • ब्राह्मण और भूमिहार मतदाता भी लगभग 16 हजार और 15 हजार के आसपास हैं. 

सपा के पास यादव मुस्लिम और राजभर वोटों का एक बेहद मजबूत और सेटल कॉम्बिनेशन है. पिछले चुनाव में ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ गठबंधन का फायदा भी सपा को मिला था. हालांकि, बीजेपी ने संजय यादव को टिकट देकर सपा के कोर वोटर यानी यादवों में सेंध लगाने की पूरी कोशिश की है.

क्या कहते हैं स्थानीय विश्लेषक?

इस सीट पर बलिया के वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की राय भी दो धड़ों में बंटी हुई है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि विधायक की 'निष्क्रियता' और जनता के काम न होने की शिकायत का सीधा फायदा इस बार बीजेपी को मिल सकता है. वहीं, कुछ अन्य जानकारों का कहना है कि बीजेपी के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी और अंतर्कलह उनके लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है. अगर बीजेपी ने कोई मजबूत और नया चेहरा नहीं उतारा, तो सपा के पारंपरिक वोट बैंक के आगे बीजेपी की राह बेहद मुश्किल हो जाएगी.

अब देखना यह होगा कि 2027 के दंगल में सिकंदरपुर की जनता मौजूदा विधायक के दावों पर भरोसा जताती है या फिर बीजेपी विरोधी लहर को भुनाकर यहां नया इतिहास रचती है.