उमाशंकर पांडे कैसे बने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद? वो संन्यासी जिससे खौफ खाती हैं सियासी सरकारें!

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और पुलिस के बीच संगम तट पर रथ ले जाने को लेकर तीखा विवाद हुआ, जिसके बाद शंकराचार्य ने इसे सरकार की 'बदला लेने वाली' कार्रवाई करार दिया. यह रिपोर्ट उमाशंकर पांडे से शंकराचार्य बनने तक के उनके सफर और अखिलेश से लेकर योगी सरकार तक उनके पुराने टकरावों की कहानी बयां करती है.

स्वीमी अविमुक्तेश्वरानंद
स्वीमी अविमुक्तेश्वरानंद

सुषमा पांडेय

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माघ मेले के पावन अवसर पर मौनी अमावस्या के दिन जहां एक तरफ संगम के तट पर आस्था का सैलाब उमड़ा, वहीं दूसरी तरफ ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए. संगम तट पर स्नान के दौरान शंकराचार्य के समर्थकों और पुलिस के बीच हुई तीखी भिड़ंत ने सियासी गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है. आखिर कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और क्यों उनका विवादों से इतना पुराना नाता रहा है?

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पुलिस बनाम शंकराचार्य

मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ संगम स्नान के लिए पहुंचे थे. पुलिस का आरोप है कि शंकराचार्य बैरिकेड तोड़कर गेट नंबर 2 से अपने रथ और पालकी के साथ प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने लगे. पुलिस कमिश्नर के अनुसार, भारी भीड़ के बावजूद वे शाही अंदाज में रथ ले जाने पर अड़े रहे, जिससे 3 घंटे तक तनाव की स्थिति बनी रही। वहीं, शंकराचार्य का कहना है कि प्रशासन ने जानबूझकर उन्हें रोका और उनके समर्थकों पर हमला किया.

उमाशंकर पांडे से 'शंकराचार्य' तक का सफर

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का शुरुआती नाम उमाशंकर पांडे था. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था. कक्षा छह तक की पढ़ाई गांव में करने के बाद वे गुजरात चले गए, जहां उनकी मुलाकात काशी के संत रामचैतन्य से हुई. यहीं से उनके सन्यास जीवन की शुरुआत हुई. बाद में वे काशी पहुंचे और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य बन गए. स्वरूपानंद सरस्वती के वे सबसे प्रिय शिष्यों में से एक रहे और 2022 में उनकी मृत्यु के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने ज्योतिष पीठ की गद्दी संभाली.

विवादों और आंदोलनों से पुराना नाता

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं. उनका सरकारों के साथ टकराव का इतिहास काफी पुराना है:

  • अखिलेश सरकार से टकराव (2015): गणेश मूर्ति विसर्जन के दौरान संतों पर हुए लाठीचार्ज में वे घायल हुए थे. उस वक्त तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनसे माफी मांगी थी.
  • योगी सरकार से अनबन: काशी कॉरिडोर निर्माण के दौरान मंदिरों को तोड़े जाने का उन्होंने पुरजोर विरोध किया. ज्ञानवापी में पूजन के ऐलान को लेकर भी उन्हें पुलिस ने रोका था.
  • कुंभ भगदड़ पर कड़ा रुख: पिछले साल महाकुंभ के दौरान हुई भगदड़ के लिए उन्होंने सीधे तौर पर सीएम योगी का इस्तीफा मांगा था और सरकार पर मौत के आंकड़े छुपाने का आरोप लगाया था.

मौजूदा स्थिति और भविष्य के सवाल

मौनी अमावस्या पर हुई इस घटना के बाद शंकराचार्य ने इसे प्रशासन की 'बदला लेने वाली' कार्रवाई बताया है. वहीं प्रशासन ने पुलिस के साथ धक्का-मुक्की और बैरिकेड तोड़ने के मामले में वैधानिक कार्रवाई करने के संकेत दिए हैं. संतों और सरकार के बीच की यह तल्खी उत्तर प्रदेश की राजनीति और धार्मिक व्यवस्था में एक नई बहस को जन्म दे रही है.

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