उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है. दहेज हत्या के केस में लखीमपुर थाने के मालखाने में रखे गहने बंदर उड़ा ले गए. ये कहना है लखीमपुर पुलिस का. पुलिस ने ये दावा अदालत में किया है. पुलिस ने मामले में क्लोजर रिपोर्ट भी दाखिल कर दी है. पुलिस ने ये भी कहा है कि उस वक्त के मालखाना इंचार्ज की मौत हो चुकी है. ऐसे में अब जांच भी संभन नहीं है. यहीं नहीं कोर्ट के आदेश में मालखाना इंचार्ज का जो नाम बताया गया वो पुलिस ने प्रेस को दिए बयान में नहीं बताया बल्कि दूसरा नाम बता दिया. अब सवाल ये है कि उस वक्त के मालखाना इंचार्ज कौन थे जो अब नहीं रहे.
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ये मामला साल 2007 के एक दहेज हत्या के केस का है. इस केस में पुलिस ने आभूषण (अंगूठी, नथुनी, चूड़ियां और हार) कोतवाली सदर के मालखाने में जमा किए थे. फरवरी 2024 में अदालत ने पति को इस केस में बरी कर दिया. बरी होने के बाद पति अपने फैमिली ज्वैलरी को वापस लेने के लिए कोर्ट में अर्जी दी. इस अर्जी के जवाब में पुलिस ने अदालत में जो दावा किया वो अब काफी चर्चा में है.
पुलिस ने बताई बंदरों वाली बात
लखीमपुर पुलिस ने कोर्ट को बताया कि 2013 में बारिश के कारण गहनों की पोटली भीग गई. ये पोटली कपड़े की थी. इसे सुखाने के लिए मालखाने की छत पर रखा गया था. यहां बंदर आए और पोटली को फाड़कर सारे गहने बिखेर दिया. फिर वे गहने लापता हो गए. गहने बंदर लेकर भाग गए.
कोर्ट ने कहा- ये दावा विश्वास के योग्य नहीं
इधर पुलिस की दलील सुनने के बाद जिला जज ने कहा कि बंदर गहने चुरा ले गए ये दावा अविश्वसनीय है. साथ ही बारिश में पोटली भीगने के बाद गहनों को छत पर सुखाने का औचित्य नहीं था. कोर्ट ने 17 सितंबर 2013 की थाना केस डायरी एंट्री पर भी ध्यान दिया. इसमें लिखा था कि जोनल IG के निरीक्षण के बाद 2013 तक के पोस्टमार्टम पैकेट छत पर रखे गए थे और फिर बंदरों ने उन्हें नुकसान पहुंचाया और बिखेर दिया. कोर्ट ने अपने आदेश में खास तौर पर कहा कि पैकेट को सुखने के लिए बाहर रखने का दावा स्वीकार्य नहीं लगता, क्योंकि पैकेट में सोना था जो पानी से खराब नहीं हो सकता और वहां दूसरी पोटलियां भी थीं, जिनमें गंभीर अपराधों के अहम सबूत थे. कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक को जांच करने का निर्देश दिया, क्योंकि उनके स्पष्टीकरण से ऐसा लग रहा था कि गहने गायब मामले में शामिल पुलिस अधिकारियों ने मालखाने से कीमती सामान निकाल लिया था और सच छिपाने के लिए झूठी डायरी रिपोर्ट बनाई थी.
पुलिस का अजीब तर्क
जुलाई 2024 के कोर्ट आदेश में उस वक्त के मालखाना इंचार्ज द्वारा दाखिल रिपोर्ट का जिक्र है. उन्होंने परिवार की अर्जी का जवाब देते हुए दावा किया कि गहनों वाला संबंधित पोस्टमार्टम पैकेट रिकॉर्ड में आगे नहीं सौंपा गया था. इस रिपोर्ट में चार पूर्व मालखाना इंचार्ज- मोल्हेराम, रमाकांत तिवारी, मेवाराम और ईश्वर दयाल के नाम हैं, जिनमें से आखिरी व्यक्ति की मौत हो चुकी है. इनमें से ईश्वर दयाल का मृत्यु दर्ज है.
पुलिस के हालिया बयान में अलग नाम का जिक्र
इसके विपरीत पुलिस के हालिया बयान में 2007-2009 के बीच के दो अलग नाम चंद्रिका प्रसाद और रामबख्श पाल बताए गए हैं. दोनों को मृत घोषित कर दिया गया है. अब सवाल ये है कि क्या पुलिस अपराधी को छिपा रही है?
पीड़ित परिवार के वकील शैलेंद्र गौड़ ने इंडिया टुडे/आजतक को बताया कि जब कथित तौर पर बंदरों का हमला हुआ, तब मालखाने का इंचार्ज असल में कौन था, इस बारे में कोई साफगोई नहीं दिखती है. गौड़ ने बताया कि 'नाम अलग-अलग हैं, कहानी बदल रही है और अब वो (पुलिस) दावा कर रहे हैं कि मालखाना इंचार्ज मर चुका है.
'ये साफ है कि पुलिस उस व्यक्ति को छिपाने या बचाने की कोशिश कर रही है, जिसने मालखाने से गहने और दूसरी चीजे चुराई थीं.' गौड़ ने ये भी कहा कि हालांकि पुलिस के प्रेस बयान में दावा किया गया है कि क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है, लेकिन कोर्ट के रिकॉर्ड में अभी तक ऐसा कुछ नहीं है. गौड़ ने कहा, '2024 के आदेश में खोए हुए गहनों के लिए मुआवजे और घटना की जांच की मांग की गई थी. हमें न तो मुआवजा मिला और न ही न्याय.'
पुलिस की कार्रवाई संदिग्ध तो स्वतंत्र जांच की जरूरत- पूर्व ASG सिद्धार्थ लूथरा
सीनियर वकील और पूर्व ASG सिद्धार्थ लूथरा ने भी इंडिया टुडे/आजताक को बताया कि ऐसे मामलों में जब पुलिस की कार्रवाई संदिग्ध हो तो स्वतंत्र जांच, यहां तक कि CBI जांच की भी जरूरत होती है. लूथरा ने कहा, 'कोर्ट ने पुलिस को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से जांच करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि पुलिस ने ऐसी रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें विसंगतियां हैं. भले ही वक्त बीत चुका है, लेकिन मामले को जांच के लिए CBI को भेजना ही सही रहेगा.'
उन्होंने याद दिलाया कि पुलिस नियमों के अनुसार, मालखाने में किसी भी चीज के आने-जाने का विस्तृत रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए, लूथरा ने ये भी टिप्पणी की कि साफ तौर पर ये रिकॉर्ड रखने वाले की गलती या लापरवाही का मामला है- मुहर्रिर (मालखाना र्क्लक) या तो खुद इसमें शामिल था या इतना लापरवाह था कि उसने दूसरों को चोरी करने या विश्वासघात करने दिया.
मालखाना क्लर्क भले ही जिंदा न हो फिर भी हो जांच- लूथरा
भले ही अगर कोर्ट के दस्तावेजों और पुलिस के बयान में विसंगतियां हैं तो अपराध को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने अंत में कहा कि भले ही मालखाना मुहर्रिर असल में जीवित न हो, लेकिन इस बात की जांच जरूर होनी चाहिए कि किसने उसके साथ साज़िश रची या उसे उकसाया और इस काम में मदद की और अपराध से उसके साथ-साथ किसे फायदा हुआ.
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