उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय समाजवादी पार्टी (सपा) के एक युवा और सक्रिय ब्राह्मण चेहरे की जमकर चर्चा हो रही है. यह चेहरा कोई और नहीं बल्कि राजधानी लखनऊ में विपक्ष की राजनीति में 'गदर' काटने वाली युवा नेता पूजा शुक्ला हैं. जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव रामचरितमानस, शंकराचार्य, और ब्राह्मण राजनीति के जरिए 'पी' (पंडित) कार्ड खेल रहे हैं, तो जमीन पर 'पी' से पूजा शुक्ला लखनऊ में पूरी मजबूती से सक्रिय दिखाई दे रही हैं. वह लगातार ब्राह्मणों से जुड़े मुद्दों पर पार्टी के लिए फ्रंट फुट पर बैटिंग कर रही हैं और अखिलेश यादव के लिए सूबे में 'ब्राह्मण मैपिंग' को मजबूत करने में जुटी हैं.
ADVERTISEMENT
शंकराचार्य की यात्रा और सपा की 'महा-तैयारी'
हाल ही में पूजा शुक्ला की चर्चा इसलिए भी तेज हो गई है क्योंकि वे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज की अगवानी के लिए लखनऊ में एक बड़े कार्यक्रम की तैयारी कर रही हैं. शंकराचार्य लगातार सरकार के खिलाफ मुखर रहे हैं और महाकुंभ में जब शंकराचार्य के बटुकों की पुलिस द्वारा कथित पिटाई का मामला सामने आया था, तब अखिलेश यादव खुलकर उनके समर्थन में उतरे थे.
अब शंकराचार्य गाय को 'राष्ट्रमाता' घोषित करने के संकल्प के साथ 'गौ रक्षा धर्म युद्ध' नाम से एक भव्य यात्रा निकाल रहे हैं. लखनऊ में इस यात्रा को लेकर पूजा शुक्ला ने एक बड़ा मंच तैयार किया है, जहां बड़े-बड़े पोस्टर्स में '24 लखनऊ चलो' का संदेश दिया गया है. इस भव्य तैयारी से साफ संदेश जा रहा है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर पूरी तरह से शंकराचार्य के साथ खड़ी है, जिसका सीधा असर साल 2027 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है.
सीएम को काला झंडा दिखाने से हुई थी सियासत की शुरुआत
लखनऊ की रहने वाली पूजा शुक्ला एक मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं, उनके पिता प्रॉपर्टी का व्यवसाय करते हैं. पूजा की राजनीति का सफर बेहद कम उम्र में ही संघर्षों के साथ शुरू हो गया था. साल 2017 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार चली गई, उसके बाद पूजा शुक्ला पहली बार सुर्खियों में आईं.
उस समय वे एमए की छात्रा थीं और उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काफिले को काला झंडा दिखा दिया था. इस घटना के बाद उन पर लाठीचार्ज हुआ, छात्रों को गिरफ्तार किया गया और यहीं से पूजा शुक्ला एक बड़ा चेहरा बनकर उभरीं. इसके बाद जब सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) का मुद्दा आया, तब भी पूजा शुक्ला सड़कों पर उतरीं और विरोध प्रदर्शनों के चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा.
मुलायम सिंह यादव की 'पॉलिटिक्स फैक्ट्री' से मिला बढ़ावा
जेल से रिहा होने के बाद पूजा शुक्ला सीधे समाजवादी पार्टी के संरक्षक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव से मिलने पहुंचीं. कहा जाता है कि नेताजी मुलायम सिंह यादव के पास छात्र नेताओं को तराश कर बड़ा नेता बनाने की एक अलग 'फैक्ट्री' थी, जिसने लखनऊ यूनिवर्सिटी से पवन पांडे जैसे कई दिग्गज चेहरे दिए. नेताजी ने पूजा शुक्ला की लगन को देखते हुए उन्हें समाजवादी छात्रसभा में शामिल कर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी. इसके बाद से पूजा शुक्ला लगातार सपा की मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हो गईं.
मैदान पर आक्रामक अंदाज और 'ब्राह्मण मुद्दों' पर मजबूत पकड़
पूजा शुक्ला अपने आक्रामक तेवरों और विरोध प्रदर्शनों के लिए जानी जाती हैं. चाहे यूपी 112 वुमेन हेल्पलाइन की महिला कर्मचारियों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस से तीखी झड़प होना हो, या बतौर प्रत्याशी चुनाव के समय बीएलओ (BLO) के सामने अपनी बात आक्रामकता से रखना हो, उनका यह जोश और जुनून पार्टी में उन्हें मजबूत जगह दिलाता है.
इसके अलावा वे लगातार बड़े ब्राह्मण मुद्दों पर सक्रिय रही हैं. कानपुर के चर्चित बिकरू कांड के बाद जब विकास दुबे के परिवार की खुशी दुबे को जेल भेजा गया था, तब पूजा शुक्ला ही वो चेहरा थीं जो खुशी दुबे की बीमार मां की आर्थिक मदद करने और बाद में खुशी दुबे को अखिलेश यादव से मिलवाने के लिए पुल का काम कर रही थीं.
अभिषेक मिश्रा का टिकट काटकर अखिलेश ने जताया था भरोसा
पूजा शुक्ला के इस बढ़ते कद और जमीनी पकड़ का ही नतीजा था कि पार्टी ने उन्हें साल 2022 के विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मौका दिया. सपा के बेहद कद्दावर नेता और अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले अभिषेक मिश्रा, जो अक्सर 'पीडीए विजन' (PDA Vision) जैसे कार्यक्रमों के मंच की कमान संभालते हैं, उनका टिकट काटकर पार्टी ने लखनऊ की शहर उत्तरी विधानसभा सीट से पूजा शुक्ला को उम्मीदवार बनाया.
हालांकि वे चुनाव नहीं जीत सकीं, लेकिन एक महिला और मजबूत युवा ब्राह्मण चेहरे के रूप में वे समाजवादी पार्टी के समीकरणों में पूरी तरह फिट बैठती हैं. अब साल 2027 के चुनावों के मद्देनजर उनकी ये सक्रियता लखनऊ से लेकर पूरे प्रदेश की राजनीति में सपा के लिए नई उम्मीदें जगा रही है.
ADVERTISEMENT


