उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव (UP Panchayat Election) को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं. गांव-गांव की चौपालों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है कि आखिर यूपी में पंचायत चुनाव कब होंगे? लेकिन अब इस सवाल का जवाब सिर्फ सरकार या चुनाव आयोग के पास नहीं है, बल्कि यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका है. हाई कोर्ट के एक कड़े रुख के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं.
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क्या है पूरा मामला और क्यों बढ़ा विवाद?
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का 5 साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा था. नियम के मुताबिक कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव करा लिए जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके ठीक एक दिन पहले यानी 25 मई 2026 को राज्य सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर दिया. इस नोटिफिकेशन के तहत मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही उनकी ग्राम पंचायत का 'प्रशासक' (Administrator) नियुक्त कर दिया गया.
सरकार के इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से सख्त लहजे में जवाब मांगा है. कोर्ट ने सरकार को 10 जुलाई 2026 तक का समय दिया है और तीन मुख्य बिंदुओं पर जवाब दाखिल करने को कहा है:
ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक (Administrator) कैसे नियुक्त कर दिया गया?
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर अब तक क्या कार्रवाई की गई है, उसकी रिपोर्ट पेश करें. कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि सरकार अपना पूरा चुनावी शेड्यूल (Election Schedule) कोर्ट के सामने रखे कि वे चुनाव कब कराने जा रहे हैं.
कौन है वो शख्स जिसने कोर्ट में सरकार को घेरा?
इस मामले में सरकार को अदालत तक खींचने वाले शख्स हैं ओम प्रकाश प्रजापति, जो कि खुद उच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता हैं. उन्होंने 3 जून 2026 को यह याचिका कोर्ट में दाखिल की थी. 'यूपी तक' से खास बातचीत में ओम प्रकाश प्रजापति और उनके सीनियर वकील पीयूष पाठक ने सरकार के फैसले को पूरी तरह असंवैधानिक बताया है.
संविधान का हवाला: वकील पीयूष पाठक ने बताया कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 243E (Article 243E) में यह स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी प्रधान का कार्यकाल 5 साल से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता. आप उसे चाहे 'प्रशासक' कहें या कोई और नाम दें, लेकिन 5 साल से ज्यादा का कार्यकाल देना पूरी तरह असंवैधानिक है.
उन्होंने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश में अब तक यह परंपरा रही है कि कार्यकाल खत्म होने पर एडीओ (ADO) को प्रशासक नियुक्त किया जाता था जो चुनाव होने तक कार्यभार संभालते थे, लेकिन सरकार ने पहली बार प्रधानों को ही यह जिम्मेदारी सौंपकर उनका कार्यकाल अगले 6 महीनों के लिए बढ़ा दिया, जो कानूनन गलत है.
यह सरकार का फेलियर है
याचिकाकर्ता के वकीलों का साफ कहना है कि समय पर चुनाव न करा पाना सरकार की नाकामी है. जो भी ओबीसी आरक्षण या कागजी कार्रवाई करनी थी, वह 5 साल के कार्यकाल के भीतर ही पूरी हो जानी चाहिए थी.
फिलहाल, जब ओम प्रकाश प्रजापति से पूछा गया कि क्या उन्हें किसी विपक्षी दल का समर्थन प्राप्त है, तो उन्होंने साफ इंकार किया. उन्होंने कहा कि वे किसी भी राजनीतिक दल (सपा या बीजेपी) से नहीं जुड़े हैं और उन्होंने एक जागरूक नागरिक और अधिवक्ता के नाते संविधान की रक्षा के लिए यह जनहित याचिका दायर की है.
अब पूरे उत्तर प्रदेश की नजरें 10 जुलाई 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं. देखना यह होगा कि कोर्ट में सरकार चुनावी तारीखों को लेकर क्या जवाब दाखिल करती है और यूपी में गांव की सरकार का भविष्य क्या मोड़ लेता है.
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