Swami Avimukhteshwaranand Controversy: प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गए हैं. संगम क्षेत्र में स्नान के दौरान उनके काफिले को रोके जाने के बाद प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच तीखी नोकझोंक हो गई. मामला बढ़ने पर पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की भी हुई.
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घटना के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए. उन्होंने प्रशासन पर धार्मिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने और जानबूझकर भगदड़ जैसी स्थिति बनाने का आरोप लगाया. उनका कहना है कि यह एक तरह से उनकी जान को खतरे में डालने जैसा था. वहीं मेला प्रशासन इन आरोपों से इनकार कर रहा है.
प्रशासन ने क्या कहा
प्रशासन का कहना है कि भारी भीड़ के कारण सुरक्षा और यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए काफिले को आगे बढ़ने से रोका गया था. प्रयागराज की कमिश्नर सौम्या अग्रवाल के अनुसार, स्नान को लेकर तय प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा था.
इस बीच मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भी जारी किया है. नोटिस में पूछा गया है कि जब ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है तो वे किस आधार पर स्वयं को शंकराचार्य बता रहे हैं. इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि शंकराचार्य कौन होगा, यह न तो सरकार तय कर सकती है और न ही कोई प्रशासनिक अधिकारी.
पुराना है शंकराचार्य पद का विवाद
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद को लेकर विवाद कई वर्षों से चल रहा है. सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हुई.
अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक पर रोक लगाने की मांग की गई थी. उनके पक्ष की दलील है कि उनका पट्टाभिषेक शृंगेरी और द्वारका पीठ की उपस्थिति में वैदिक विधि से हो चुका है, इसलिए वे वैध रूप से शंकराचार्य हैं.
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों, द्वारका, पुरी, शृंगेरी और बद्रिकाश्रम (ज्योतिर्मठ) में से तीन की स्थिति स्पष्ट मानी जाती है, जबकि ज्योतिर्मठ को लेकर असमंजस बना हुआ है.
राजनीति से भी रहा है गहरा नाता
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का नाम केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक विवादों से भी जुड़ता रहा है. वे कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों की खुलकर आलोचना कर चुके हैं.
2015 में वाराणसी में गणेश विसर्जन के दौरान हुए टकराव में वे पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुए थे. 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उम्मीदवार भी उतारा था.
राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय भी उन्होंने निर्माण पूरा होने से पहले मूर्ति स्थापना का विरोध किया था, जिससे वे एक बार फिर सुर्खियों में आ गए थे.
बचपन से संन्यास तक का सफर
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था. उनका बचपन का नाम उमाशंकर उपाध्याय था. महज 9-10 साल की उम्र में वे घर छोड़कर गुजरात चले गए थे.
वहां वे ब्रह्मचारी राम चैतन्य के संपर्क में आए और संस्कृत शिक्षा की ओर बढ़े. उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की पढ़ाई की. बनारस में पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1994 में छात्रसंघ का चुनाव लड़ा.
15 अप्रैल 2003 को उन्होंने दंड संन्यास ग्रहण किया था और उनका नाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पड़ा. इसके बाद वे गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिलाने जैसे आंदोलनों में भी सक्रिय रहे.
उन्होंने 15 अप्रैल 2003 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के लिए अनशन किया था. सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बड़े भाई गिरिजा शंकर पांडेय और उनके बेटे भी कथावाचक हैं, भागवत व राम कथा कहते हैं.
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