चमोली: 12 साल बाद मायके से कैलाश के लिए विदा हुईं मां नंदा, विदाई के समय भावुक हो उठे श्रद्धालु

कमल नयन सिलोड़ी

• 05:00 PM • 06 Sep 2026

Nanda Devi Yatra 2026: उत्तराखंड के चमोली में 12 साल बाद मां नंदा की बड़ी जात का शुभारंभ हुआ है. कुरुड़ से कैलाश धाम के लिए निकली डोलियों के साथ हजारों श्रद्धालु यात्रा में शामिल हुए. करीब 280 किलोमीटर की यह यात्रा कई मायनों में बेहद खास है.

मायके से ससुराल कैलास के लिए विदा हुईं मां नंदा
मायके से ससुराल कैलास के लिए विदा हुईं मां नंदा
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Nanda Devi Raj Jat 2026: उत्तराखंड की पावन धरा चमोली में 12 वर्षों के लंबे और उत्सुकता भरे इंतजार के बाद एक बार फिर लोक आस्था, संस्कृति और परंपरा का महासंगम देखने को मिल रहा है. चमोली जनपद स्थित सिद्धपीठ कुरुड़ से शनिवार को वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मां नंदा की बड़ी जात का भव्य शुभारंभ हो गया. कुरुड़ मंदिर से मां नंदा की पवित्र डोलियों ने जैसे ही अपने मायके से पतिगृह कैलाश धाम के लिए प्रस्थान किया, पूरा क्षेत्र मां नंदा के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा. हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने दर्शन कर सुख-समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मांगा.

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मायके से बेटी की तरह हुई मां नंदा की भावुक विदाई

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल और लोक संस्कृति में मां नंदा को केवल एक देवी के रूप में ही नहीं पूजा जाता, बल्कि उन्हें घर की बेटी और 'ध्याणी' (मायके आने वाली बेटी) का दर्जा प्राप्त है. इसी आध्यात्मिक भाव के कारण जब मां नंदा की डोली मायके कुरुड़ से रवाना हुई, तो वहां मौजूद ध्याणियों और स्थानीय महिलाओं के सब्र का बांध टूट गया.

डोली प्रस्थान के समय ढोल-दमाऊं की थाप, जागरों की गूंज और मांगल गीतों के बीच कई महिलाएं फफक-फफक कर रो पड़ीं. यह नजारा ठीक वैसा ही था, जैसे किसी परिवार की बेटी अपनी शादी के बाद अपने मायके को छोड़कर ससुराल के लिए विदा हो रही हो. नम आंखों और भारी मन से क्षेत्रवासियों ने अपनी ध्याणी को कैलाश धाम के लिए विदा किया.

हिमालय के दुर्गम रास्तों पर 280 किलोमीटर की कठिन यात्रा

सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरू हुई मां नंदा की बड़ी जात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सदियों पुरानी संस्कृति की जीवंत झलक है. यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर लंबे कठिन और दुर्गम हिमालयी मार्ग से होकर गुजरेगी. यात्रा के दौरान मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली, कुरुड़ दशोली की नंदा डोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोली अपने-अपने निर्धारित और पारंपरिक रास्तों से आगे बढ़ रही हैं.

मार्ग में पड़ने वाले हर गांव और पड़ाव पर स्थानीय ग्रामीण ढोल-दमाऊं, झोड़ा और चांचरी लोकनृत्यों के साथ डोली का स्वागत कर रहे हैं. इस पवित्र यात्रा में भाग लेने के लिए दूर-दराज के शहरों और विदेशों में रहने वाले प्रवासी ग्रामीण भी वापस अपने गांव पहुंचे हैं, जिससे पूरे सीमांत क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बना हुआ है.

20 सितंबर को होमकुंड में संपन्न होगा मुख्य अनुष्ठान

इस 280 किलोमीटर लंबी यात्रा का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पड़ाव 'होमकुंड' माना जाता है. आगामी 20 सितंबर को होमकुंड के मुख्य धार्मिक स्थल पर विशेष पूजा-अर्चना और मुख्य अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे.

परंपरा के अनुसार, इस दौरान एक चार सींग वाले बकरे (जिसे स्थानीय भाषा में 'चौसिंग्या खाडू' कहा जाता है) को भी धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ कैलाश की ओर विदा किया जाएगा. पहाड़ की मान्यताओं में चौसिंग्या खाडू का विशेष धार्मिक महत्व है और इसे इस कठिन हिमालयी मार्ग पर मां नंदा की यात्रा का मुख्य मार्गदर्शक और प्रहरी माना जाता है.

आयोजन के स्वरूप को लेकर चर्चा, फिर भी अटूट दिखी आस्था

इस वर्ष मां नंदा की यात्रा के आयोजन और उसके स्वरूप को लेकर विभिन्न धार्मिक समितियों के बीच कुछ अलग-अलग मत भी देखने को मिले हैं. मुख्य रूप से नौटी और कुरुड़ से जुड़ी समितियों के बीच बड़ी जात और नंदा राजजात के आयोजन वर्ष को लेकर चर्चाएं रहीं. नौटी समिति का मानना है कि पारंपरिक नंदा राजजात का आयोजन वर्ष 2027 में किया जाना चाहिए, जबकि कुरुड़ मंदिर समिति द्वारा मां नंदा की बड़ी जात का आयोजन 2026 में ही शुरू कर दिया गया है. हालांकि, आयोजन के नाम और वर्ष को लेकर बनी इन अलग-अलग राय के बावजूद श्रद्धालुओं और आम जनता की अगाध श्रद्धा पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. भक्त पूरी निष्ठा, आस्था और भक्ति भाव के साथ मां नंदा के दर्शन और उनकी विदाई यात्रा में शामिल हो रहे हैं.

प्रशासन की व्यवस्थाएं मुस्तैद, पड़ावों पर कड़ी सुरक्षा

हिमालयी क्षेत्रों में लगातार हो रही बारिश, भूस्खलन की आशंका और दुर्गम रास्तों को देखते हुए चमोली जिला प्रशासन पूरी तरह से सतर्क है. चमोली के उपजिलाधिकारी (एसडीएम) आर. के. पांडे ने बताया कि नंदा जात यात्रा के सुगम संचालन के लिए प्रशासन ने व्यापक स्तर पर तैयारियां की हैं. श्रद्धालुओं और डोलियों की सुरक्षा के लिए यात्रा मार्ग के सभी मुख्य पड़ावों पर स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षा बल और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं. प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यात्रा के दौरान यदि कहीं भी रास्तों या व्यवस्थाओं में कोई कमी पाई जाती है, तो उसे तत्काल प्रभाव से दुरुस्त किया जाएगा ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े.

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