Uttarakhand Election 2027: भाजपा की हैट्रिक या कांग्रेस की वापसी? जानिए क्या कहती है 'रुद्र रिसर्च' की रिपोर्ट

न्यूज तक डेस्क

08 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 8 2026 8:58 PM)

Uttarakhand Election 2027 Analysis: क्या उत्तराखंड में लगेगी भाजपा की हैट्रिक या होगी कांग्रेस की वापसी? पढ़िए 'रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स' की बेहद विस्तृत रिपोर्ट, जातीय समीकरण और बड़े चुनावी मुद्दे.

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: भाजपा की हैट्रिक या कांग्रेस की वापसी?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: भाजपा की हैट्रिक या कांग्रेस की वापसी?
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Uttarakhand Election 2027: हिमालय की गोद में बसा 'देवभूमि' उत्तराखंड भौगोलिक रूप से भले ही देश का एक छोटा राज्य नजर आता हो, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर इसका स्थान बेहद महत्वपूर्ण है. यहां की सियासत मुख्य रूप से चार स्तंभों-धार्मिक पर्यटन, सीमावर्ती सुरक्षा, सैन्य परंपरा और प्रखर हिंदुत्व के इर्द-गिर्द घूमती है. 70 विधानसभा सीटों और करीब 48 लाख 36 हजार 608 मतदाताओं वाले इस राज्य में ऐतिहासिक रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है. हालांकि, बहुजन समाज पार्टी (बसपा), आम आदमी पार्टी (आप), उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसी ताकतें कुछ खास सीटों पर खेल बिगाड़ने या बनाने की क्षमता रखती हैं.

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वर्ष 2022 के चुनाव में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल कर राज्य में हर पांच साल पर सरकार बदलने के पारंपरिक रिवाज को तोड़ दिया था. अब वर्ष 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा के सामने सत्ता की हैट्रिक लगाने की बड़ी चुनौती है, वहीं कांग्रेस के लिए यह खोई हुई जमीन वापस पाने का एक बड़ा अवसर और परीक्षा दोनों है. इस सियासी समर को समझने के लिए 'रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स, पुणे' की टीम ने उत्तराखंड का व्यापक जमीनी दौरा किया. इस विस्तृत चुनावी विश्लेषण रिपोर्ट में सामाजिक समीकरणों, वोट प्रतिशत के बदलते ट्रेंड और जमीनी मुद्दों के आधार पर राज्य की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को डिकोड किया गया है.

परिवर्तन के रिवाज से ‘धामी मॉडल’ की अग्निपरीक्षा तक

उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से ही यहां की जनता एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा को चुनने के ढर्रे पर चल रही थी. लेकिन 2022 में भाजपा ने इस मिथक को मटियामेट कर दिया. अगर राज्य के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो- 

  • 2002: कांग्रेस ने 70 में से 36 सीटें जीतकर पहली स्पष्ट बहुमत वाली सरकार बनाई, जबकि भाजपा 19 सीटों पर सिमट गई थी.
  • 2007: भाजपा ने पासा पलटा और 34 सीटें जीतकर निर्दलीयों व क्षेत्रीय दलों के सहयोग से सरकार का गठन किया.
  • 2012: कांग्रेस 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन आंतरिक कलह और मुख्यमंत्री पद की खींचतान के कारण सरकार अस्थिरताओं से जूझती रही.
  • 2017: 'मोदी लहर' और कांग्रेस के भीतर बड़े बिखराव का फायदा उठाते हुए भाजपा ने रिकॉर्ड 57 सीटें हासिल कीं, जबकि कांग्रेस महज 11 सीटों पर सिमट गई. प्रचंड बहुमत के बावजूद भाजपा ने पांच साल में त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और अंत में पुष्कर सिंह धामी के रूप में तीन मुख्यमंत्री बदले, ताकि सत्ता विरोधी लहर को कम किया जा सके.
  • 2022: भाजपा ने 47 सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनाई. हालांकि, तत्कालीन मुख्यमंत्री चेहरा पुष्कर सिंह धामी खुद खटीमा सीट से चुनाव हार गए थे, लेकिन संगठन ने उन पर भरोसा जताया और वे बाद में चंपावत उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे.

भाजपा की इस निरंतर मजबूती के पीछे केवल मोदी लहर ही नहीं, बल्कि केंद्र व राज्य की डबल इंजन सरकार की योजनाएं रहीं. इनमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, कोविड टीकाकरण, चारधाम ऑल-वेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट और केदारनाथ-बद्रीनाथ पुनर्निर्माण कार्य शामिल हैं. साथ ही 'वन रैंक-वन पेंशन' (OROP), राष्ट्रवाद, देवस्थानम बोर्ड को भंग करना और समान नागरिक संहिता (UCC) जैसे साहसिक फैसलों ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाए रखा.

कांग्रेस की ये कमजोरी बढ़त को सीटों में कनवर्ट नहीं कर पाई

दूसरी तरफ, कांग्रेस ने हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य जैसे कद्दावर नेताओं की घर वापसी कराकर सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश जरूर की, जिससे अनुसूचित जाति (SC) के मतों में सुधार भी हुआ, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी के कारण वह इस बढ़त को सीटों में तब्दील नहीं कर पाई.

वर्तमान में भाजपा की ताकत

वर्तमान में भाजपा की ताकत उसका जमीनी संगठन, आरएसएस (RSS) का नेटवर्क, ठाकुर-ब्राह्मण-जौनसार समुदायों का मजबूत गठजोड़ और सीएम धामी की युवा छवि है. जुलाई 2026 में धामी उत्तराखंड के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहने वाले नेता भी बन चुके हैं. ऐसे में 2027 का यह चुनाव सीधे तौर पर 'धामी मॉडल' की सफलता या असफलता का लिटमस टेस्ट होने जा रहा है.

मत प्रतिशत का गणित: क्या कह रहे हैं दो दशकों के आंकड़े?

उत्तराखंड की राजनीति में केवल सीटें ही नहीं, बल्कि वोट शेयर का उतार-चढ़ाव भी भविष्य के बड़े संकेत देता है:

चुनाव वर्ष बीजेपी वोट शेयर कांग्रेस वोट शेयर बसपा वोट शेयर
2002 25% 27% 11%
2007 32% 30% 12%
2012 33% 34% -
2017 47% 34% 7%
2022 45% 38% -

इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो साफ होता है कि शुरुआत में मतदाता पूरी तरह द्विदलीय राजनीति की तरफ केंद्रित नहीं थे, लेकिन धीरे-धीरे अन्य और बसपा का जनाधार खिसकता गया. 2017 में मोदी लहर के दम पर भाजपा का वोट शेयर सीधे 47% पहुंच गया था, जो 2022 में मामूली गिरावट के साथ 45% पर रहा. वहीं, कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह रही कि सीटों के नुकसान के बावजूद 2022 में उसका वोट शेयर सुधरकर 38% हो गया. बसपा का ग्राफ लगातार गिरा है और उसका पारंपरिक दलित व वंचित वर्ग का वोट बैंक अब कांग्रेस और कुछ हद तक भाजपा के पाले में जाता दिख रहा है. 2027 में कांग्रेस के सामने इस बढ़े हुए वोट शेयर को सीटों में बदलने की चुनौती होगी, तो भाजपा के लिए अपने 45% के विशाल वोट बैंक को बचाए रखना सबसे बड़ा लक्ष्य होगा.

'आप' और बसपा: तीसरे विकल्प की सीमाएं और असर

उत्तराखंड की सियासत में तीसरे मोर्चे की गुंजाइश हमेशा से सीमित रही है, लेकिन कुछ सीटों पर ये किंगमेकर या वोटकटवा की भूमिका निभाते हैं:

आम आदमी पार्टी (AAP): 'आप' ने 2027 में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान किया है. 2022 में कर्नल अजय कोठियाल को सीएम चेहरा बनाने के बावजूद पार्टी को 0 सीटें और महज 3.4% वोट शेयर मिला था. कोठियाल के पार्टी छोड़ने के बाद संगठन कमजोर हुआ. अरविंद केजरीवाल ने उमा सिसोदिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पुनर्गठन तो शुरू किया है, लेकिन जमीनी बूथ नेटवर्क न होने से 'आप' फिलहाल 'वोटकटवा' की भूमिका में ज्यादा दिख रही है, जिससे सीधा नुकसान कांग्रेस को और परोक्ष लाभ भाजपा को हो सकता है.

बहुजन समाज पार्टी (BSP): राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होने के बावजूद बसपा ने 2022 में हरिद्वार और उधमसिंहनगर के तराई इलाकों में अपनी मजबूत पकड़ की बदौलत 2 सीटें जीती थीं. 2027 के लिए बसपा ने सभी 70 सीटों पर ऊर्जा बर्बाद करने के बजाय 15-20 'फोकस सीटों' पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति बनाई है. हालांकि, मंगलौर उपचुनाव के नतीजों से साफ है कि दलित वोट बैंक का एक हिस्सा अब दोबारा कांग्रेस और सरकारी योजनाओं के चलते भाजपा की तरफ शिफ्ट हो रहा है.

क्या होंगे 2027 के सबसे बड़े चुनावी मुद्दे?

'रुद्र रिसर्च' के मुताबिक, आगामी चुनाव पूरी तरह से स्थानीय और पर्वतीय सरोकारों पर केंद्रित रहने वाला है. प्रचार के केंद्र में ये मुख्य मुद्दे होंगे:

अंकिता भंडारी हत्याकांड: कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा को लेकर विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को लगातार घेर रहा है.

अग्निवीर योजना: सैन्य बहुल राज्य होने के कारण सेना में चार साल की इस भर्ती योजना को लेकर युवाओं और पूर्व सैनिकों में उपजा असंतोष एक बड़ा फैक्टर बनेगा.

पेपर लीक और बेरोजगारी: विभिन्न सरकारी भर्ती परीक्षाओं में हुए पेपर लीक के मामलों ने युवाओं के भीतर अविश्वास पैदा किया है, जिसे कांग्रेस भुनाने की कोशिश में है.

पलायन और 'घोस्ट विलेज': पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन और खाली होते गांव (भूतहा गांव) उत्तराखंड की एक स्थाई दर्दनाक समस्या है.

खनन और पर्यावरणीय असंतुलन: नदियों के तटों पर हो रहा अत्यधिक खनन और पहाड़ों में बढ़ता पर्यावरणीय असंतुलन भी चुनावी एजेंडे में शीर्ष पर रहेगा.

गैरसैंण का विकास: राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के विकास की धीमी रफ्तार पर भी जनता की नजर रहेगी.

निष्कर्ष: क्या कहता है रुद्र रिसर्च का अंतिम निचोड़?

उत्तराखंड का आगामी 2027 का रण मुख्य रूप से भाजपा बनाम कांग्रेस के सीधे दंगल का ही गवाह बनेगा.

भाजपा के पक्ष में: समान नागरिक संहिता (UCC), हरिद्वार में आगामी कुंभ मेला, प्रखर हिंदुत्ववादी संगठनों का जमीनी नेटवर्क, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बेदाग युवा छवि और रैलियों में योगी आदित्यनाथ का प्रचंड प्रभाव भाजपा को मजबूत बढ़त दिला सकता है.

कांग्रेस के पक्ष में: यदि कांग्रेस पार्टी अपनी अंदरूनी गुटबाजी को दरकिनार कर सामूहिक नेतृत्व के साथ अंकिता भंडारी केस, पेपर लीक, अग्निवीर योजना के प्रति उपजे गुस्से और 10 साल की सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को भुनाने में पूरी तरह सफल रहती है, तो राज्य में सत्ता परिवर्तन का मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प हो जाएगा.

तीसरे विकल्प के तौर पर मौजूद बसपा और आम आदमी पार्टी भले ही सत्ता की रेस से बाहर दिख रही हों, लेकिन तराई और मैदानी इलाकों में दलित व मुस्लिम मतों का विभाजन कर वे कई सीटों के नतीजों को पूरी तरह से प्रभावित करने का माद्दा रखती हैं.