Diwali 2026: लक्ष्मी पूजा के लिए सिर्फ 1 घंटा 56 मिनट का शुभ समय, जानें सही टाइम
आज 8 नवंबर को दिवाली मनाई जा रही है. लक्ष्मी-गणेश पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से रात 7:50 बजे तक है. प्रदोष काल रात 8:09 बजे तक रहेगा. जानिए अमावस्या तिथि, व्यापारिक पूजा का समय, महानिशीथ काल, पूजा विधि और लक्ष्मी-गणेश की पूजा से जुड़ी धार्मिक कथा.
ADVERTISEMENT

आज 8 नवंबर को देशभर में दिवाली का त्योहार मनाया जा रहा है. इस दिन शाम को घरों में दीप जलाए जाएंगे और मां लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की पूजा होगी. दिवाली पर लक्ष्मी पूजन के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि सही समय पर विधि-विधान से पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है.
इस साल दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 54 मिनट से रात 7 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. यानी पूजा के लिए कुल 1 घंटा 56 मिनट का समय मिलेगा. इस दौरान श्रद्धालु मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं.
दिवाली 2026 पर लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार लक्ष्मी पूजन का शुभ समय प्रदोष काल और वृषभ लग्न में पड़ रहा है. वृषभ लग्न को स्थिर लग्न माना जाता है. इसलिए गृहस्थों के लिए इस समय पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है.
धार्मिक मान्यता है कि वृषभ लग्न में मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है. यही वजह है कि दिवाली की शाम इस मुहूर्त में लक्ष्मी-गणेश पूजन को खास महत्व दिया जाता है.
आज कितने बजे शुरू होगा प्रदोष काल?
दिवाली पर प्रदोष काल का भी विशेष महत्व है. कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल शुरू होता है. इस साल 8 नवंबर को सूर्यास्त शाम 5 बजकर 31 मिनट पर होगा.
इसके बाद प्रदोष काल शुरू होकर रात 8 बजकर 9 मिनट तक रहेगा. इस दौरान भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है. लोग अपने घरों के मंदिर में दीपक जलाकर परिवार के साथ आरती करते हैं. घर के मुख्य दरवाजे पर दीप जलाने की भी परंपरा है.
दिवाली पर अमावस्या तिथि कब तक रहेगी?
दिवाली का त्योहार कार्तिक महीने की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है. पंचांग के अनुसार, इस साल अमावस्या तिथि 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट पर शुरू हो रही है. इसका समापन 9 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट पर होगा.
इसी अमावस्या तिथि में आज दिवाली का मुख्य पूजन और दीपोत्सव किया जाएगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार, अमावस्या की रात दीप जलाने से अंधकार पर प्रकाश की जीत का संदेश मिलता है. इसे नकारात्मकता पर सकारात्मकता की जीत का प्रतीक भी माना जाता है.
व्यापारियों के लिए दिवाली पूजा का शुभ समय
दिवाली पर घरों के साथ बाजारों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में भी पूजा की जाती है. व्यापारी अपने बही-खातों, तिजोरी और कारोबार से जुड़ी वस्तुओं की पूजा करते हैं. इस साल व्यापारिक प्रतिष्ठानों में पूजा के लिए कुंभ लग्न दोपहर 1 बजकर 27 मिनट से 2 बजकर 54 मिनट तक रहेगा. वहीं सिंह लग्न का समय रात 12 बजकर 25 मिनट से 2 बजकर 42 मिनट तक बताया गया है. व्यापारी अपनी परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय तय कर सकते हैं.
दिवाली पर महानिशीथ काल का समय क्या है?
दिवाली की रात महानिशीथ काल को विशेष साधना और मंत्र जाप के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. यह समय सामान्य गृहस्थ पूजा से अलग होता है. इस साल महानिशीथ काल रात 11 बजकर 39 मिनट से देर रात 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा. वहीं निशा पूजा और काली पूजा के लिए रात 1 बजकर 37 मिनट से 3 बजकर 15 मिनट तक का समय बताया गया है.
दिवाली पर कैसे करें लक्ष्मी-गणेश की पूजा?
दिवाली पर पूजा करने से पहले घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें. इसके बाद एक चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें. पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप, मिठाई और फल रखें. सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें. उन्हें दूर्वा, फूल और मोदक चढ़ाएं. इसके बाद माता लक्ष्मी को कमल का फूल, मिठाई और सुगंधित पुष्प अर्पित करें.
मां लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाएं. इसके बाद परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती करें. पूजा के दौरान घर में सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और धन-धान्य की कामना करें. पूजा पूरी होने के बाद घर के मुख्य दरवाजे, आंगन, बालकनी और तुलसी के पास दीपक जलाएं. इसके बाद परिवार के साथ दिवाली का त्योहार मनाएं.
दिवाली पर लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है?
दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा के पीछे एक धार्मिक कथा प्रचलित है. कथा के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी को अपने धन और वैभव पर गर्व हो गया था. उन्हें लगने लगा कि संसार में हर व्यक्ति उनकी कृपा से ही सुखी और संपन्न है. तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि केवल धन ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं है. परिवार, संतान और विवेक के बिना संपन्नता अधूरी है. इस बात से माता लक्ष्मी को अपने संतान न होने का एहसास हुआ.
इसके बाद उन्होंने माता पार्वती से भगवान गणेश को पुत्र के रूप में स्वीकार करने की इच्छा जताई. माता पार्वती ने उनकी यह इच्छा पूरी कर दी. इसके बाद मां लक्ष्मी ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति उनकी पूजा करेगा, उसे भगवान गणेश की आराधना भी करनी होगी. तभी से दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा मानी जाती है.
इस कथा का संदेश है कि जीवन में धन के साथ बुद्धि और विवेक भी जरूरी हैं. मां लक्ष्मी को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जबकि भगवान गणेश बुद्धि, शुभ शुरुआत और विघ्नों को दूर करने वाले देवता माने जाते हैं. इसलिए दिवाली पर दोनों की एक साथ पूजा की जाती है.
