नीतीश सरकार की चमचमाती सड़कों के विकास की हकीकत! खर्च हुए करोड़ों रुपए लेकिन 15 साल बाद भी काम अधूरा
Bihar road development: बिहार में नीतीश सरकार की विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने आ रही है. बख्तियारपुर-ताजपुर फोरलेन से लेकर पटना साहिब-पटना घाट सड़क और छपरा डबल डेकर फ्लाईओवर तक, करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद 10 से 15 साल बाद भी कई सड़क परियोजनाएं अधूरी हैं. बढ़ती लागत, बार-बार बढ़ती डेडलाइन और जनता की परेशानी ने सरकार के विकास दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

बिहार में नीतीश सरकार बराबर विकास की बातें कहती है, जिसमें सड़क से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तक शामिल होते है. नेताओं से लेकर सरकारी विज्ञापनों तक आपको चमचमाती सड़कों और बड़े-बड़े पुलों की तस्वीरें भी खूब दिखती हैं. लेकिन अब आप जमीनी स्तर पर चीजों को देखेंगे तो हकीकत कुछ और ही देखने को मिलती है. नीतीश सरकार की कई ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाएं सालों से अधूरी है और आज भी पूरी नहीं हो पाई है, हुआ तो सिर्फ डेडलाइन आगे बढ़ाने का काम. इसकी वजह से टैक्स का पैसा पानी की तरह बह रहा और जनता वहीं धूल भरी सड़कों में चलने को मजबूर है.
15 साल बीते, पर सफर अब भी अधूरा
सबसे पहले बात करते हैं बख्तियारपुर-ताजपुर फोरलेन की.पटना जिले के बख्तियारपुर को समस्तीपुर के ताजपुर से जोड़ने यह प्रोजेक्ट साल 2011 में शुरू हुआ था, जिसमें की साल 2016 तक 51.26 किलोमीटर लंबी सड़क बननी थी. लेकिन आज 15 साल बाद भी आलम यह है कि काम सिर्फ 65% ही हुआ है. जो सड़क 1600 करोड़ में बननी थी, उसकी लागत अब बढ़कर 3923 करोड़ बताई जा रही है. इसके साथ ही अब इस परियोजना को पूरा करने की अगली डेडलाइन 2027 दी गई है.
1.5 किलोमीटर की सड़क भी बनी चुनौती
सुनने में अजीब लगता है, लेकिन पटना साहिब-पटना घाट की महज 1.5 किलोमीटर लंबी सड़क भी सरकार के लिए सिरदर्द बन गई है. पिछले साल दावा हुआ था कि एक साल में काम पूरा होगा, लेकिन अब जब समय खत्म होने को है, तो पता चला कि सिर्फ 35% काम हुआ है. खुद मुख्यमंत्री इसकी निगरानी कर चुके हैं, फिर भी रफ्तार वही कछुआ चाल वाली है.
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जाम से कब मिलेगी मुक्ति?
छपरा के लोग भी डबल डेकर फ्लाईओवर का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. 2018 में बड़े जोर-शोर से इसकी नींव रखी गई थी. कहा गया था कि 2022 तक यह शहर को जाम से मुक्ति दिला देगा, लेकिन 2025 आने को है और काम 60% पर ही अटका है. यही हाल दिल्ली-जयपुर हाईवे का भी है, जो 16 साल बाद भी छह लेन का नहीं हो सका.
नुकसान किसका, फायदा किसका?
इन सब देरी में सबसे ज्यादा चोट आम जनता की जेब और सुकून पर पड़ती है. जानकारों का कहना है कि प्रोजेक्ट जितना लंबा खिंचता है, ठेका लेने वाली कंपनियों की चांदी हो जाती है क्योंकि लागत बढ़ती जाती है. सरकारी खजाना खाली होता है और जनता को सिर्फ इंतजार मिलता है.
जिम्मेदार कौन?
पथ निर्माण विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले मंत्रियों की लिस्ट तो लंबी है जिसमें नंदकिशोर यादव से लेकर तेजस्वी यादव और अब नितिन नबीन तक शामिल है. वर्तमान मंत्री दिलीप जायसवाल का कहना है कि अब लापरवाही नहीं चलेगी और अधिकारियों पर कार्रवाई हो रही है. लेकिन सवाल आज भी वही है कि क्या बिहार की सड़कें सिर्फ कागजों और विज्ञापनों में ही दौड़ेंगी, या वाकई कभी समय पर पूरी भी होंगी?
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