9 साल में जितना लगाया, 2 साल में उतना निकाला! भारतीय बाजार से FII का मोहभंग क्यों?

विदेशी निवेशकों ने दो साल में 63.6 अरब डॉलर के शेयर बेचे, फिर भी चुनिंदा क्षेत्रों और नए शेयरों में निवेश जारी है. जानें बाजार पर इसका आगे क्या असर होगा.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

अमेरिकी बॉन्ड की ऊंची कमाई ने भारतीय शेयरों का आकर्षण घटाया

मजबूत डॉलर और महंगे कच्चे तेल ने रुपये पर दबाव बढ़ाया

वित्तीय, वाहन और तेल-गैस शेयरों में सबसे अधिक निकासी हुई

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की दूरी बढ़ती जा रही है. पिछले करीब दो वर्षों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयरों में इतनी बड़ी बिकवाली की है कि अक्टूबर 2015 से सितंबर 2024 के बीच की उनकी पूरी शुद्ध खरीदारी लगभग खत्म हो गई है. इस दौरान विदेशी निवेशकों ने करीब 63.5 अरब डॉलर का निवेश किया था, जबकि अक्टूबर 2024 के बाद से लगभग 63.6 अरब डॉलर की शुद्ध बिकवाली कर चुके हैं.

यह बदलाव ऐसे समय में आया है, जब भारतीय बाजार में घरेलू निवेशकों की भूमिका लगातार अहम बनी हुई है. सवाल यह है कि विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से पैसा क्यों निकाल रहे हैं और क्या निकट भविष्य में उनकी वापसी की उम्मीद की जा सकती है?

2026 में तेज हुई विदेशी निवेशकों की बिकवाली

विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव 2026 में और बढ़ा है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक भारतीय शेयरों से 32.8 अरब डॉलर निकाले हैं. इससे पहले 2025 में वे 18.9 अरब डॉलर की शुद्ध बिकवाली कर चुके थे.

महीनेवार आंकड़ों में मार्च 2026 सबसे कमजोर रहा, जब विदेशी निवेशकों ने 12.7 अरब डॉलर निकाले. अप्रैल में 6.5 अरब डॉलर और जून में 5.2 अरब डॉलर की निकासी हुई.

इस लगातार बिकवाली के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं. इनमें अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड, मजबूत डॉलर, महंगा कच्चा तेल और भारतीय शेयरों से मिलने वाले अपेक्षाकृत कमजोर रिटर्न शामिल हैं.

विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी क्यों घटी?

विदेशी निवेशक किसी बाजार में पैसा लगाते समय केवल शेयरों की तेजी नहीं देखते, बल्कि दूसरे देशों में मिलने वाले रिटर्न और जोखिम की भी तुलना करते हैं.

अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर करीब 5.3 फीसदी यील्ड मिलने से विदेशी निवेशकों के लिए वहां पैसा लगाना आकर्षक विकल्प बन सकता है. इसके मुकाबले भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने पर उन्हें बाजार की अस्थिरता और रुपये में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी उठाना पड़ता है.

PL Capital के अमनीश अग्रवाल के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में Nifty 100 ने डॉलर के आधार पर सालाना औसतन करीब 1.2 फीसदी रिटर्न दिया है. इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर जैसे वैश्विक निवेश के चर्चित क्षेत्रों में भारत की सीमित हिस्सेदारी भी विदेशी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर रही है.

महंगा कच्चा तेल भी चिंता बढ़ाता है. इससे भारत के आयात बिल पर दबाव पड़ सकता है, रुपये की कमजोरी बढ़ सकती है और कंपनियों की लागत प्रभावित हो सकती है.

बैंकिंग, ऑटो और तेल-गैस शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली

Motilal Oswal Financial Services के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में विदेशी निवेशकों ने कुछ बड़े सेक्टरों में भारी बिकवाली की है.

  • फाइनेंशियल शेयर: करीब 12.2 अरब डॉलर की निकासी.

  • ऑटो सेक्टर: लगभग 4.1 अरब डॉलर की बिकवाली.

  • ऑयल और गैस: करीब 3.9 अरब डॉलर के शेयर बेचे.

  • हालांकि, विदेशी निवेशकों ने सभी क्षेत्रों से दूरी नहीं बनाई. उन्होंने मेटल, कैपिटल गुड्स और सर्विसेज जैसे सेक्टरों में निवेश बढ़ाया है. इससे संकेत मिलता है कि विदेशी पूंजी का रुख पूरी तरह भारत के खिलाफ होने के बजाय ज्यादा चुनिंदा होता जा रहा है.

    घरेलू निवेशकों ने बाजार को दिया सहारा

    विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने बाजार को संभालने में अहम भूमिका निभाई है. सितंबर में विदेशी निवेशकों ने 4.1 अरब डॉलर निकाले, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 8 अरब डॉलर का निवेश किया.

    विदेशी निवेशकों की रणनीति का एक और पहलू भी है. Motilal Oswal के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने पहले से सूचीबद्ध शेयरों में करीब 63 अरब डॉलर की बिकवाली की, लेकिन इसी दौरान IPO और दूसरे नए शेयर निर्गमों में करीब 21 अरब डॉलर लगाए.

    इसका मतलब है कि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पूरी तरह बाहर नहीं हुए हैं, बल्कि वे नए निर्गमों और चुनिंदा कंपनियों में अवसर तलाश रहे हैं.

    क्या विदेशी निवेशकों की वापसी होगी?

    HSBC के मुताबिक, भारतीय शेयरों का वैल्यूएशन अब पहले के मुकाबले आकर्षक हुआ है. Nifty 50 करीब 16 गुना अगले 12 महीनों की अनुमानित कमाई के स्तर पर कारोबार कर रहा था. यह वैल्यूएशन पिछले दशक में बहुत कम मौकों पर देखने को मिला है.

    हालांकि, कम वैल्यूएशन अपने आप बाजार में तेजी की गारंटी नहीं देता. कंपनियों की कमाई में बढ़ोतरी, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट विदेशी निवेशकों की वापसी के लिए अहम हो सकती है.

    फिलहाल, विदेशी निवेशकों की बिकवाली बाजार पर दबाव बनाए रख सकती है. लेकिन बाजार की दिशा केवल विदेशी पूंजी से तय नहीं होगी. कंपनियों के नतीजे, शेयरों का वैल्यूएशन और घरेलू निवेश भी आगे की चाल में अहम भूमिका निभाएंगे.