भारत के Forex Reserve में 5 हफ्तों में $60 अरब की गिरावट, क्या रुपये पर बढ़ रहा है दबाव?
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पांच हफ्तों में करीब 60 अरब डॉलर घटा. जानें महंगा कच्चा तेल, रुपये पर दबाव और आरबीआई की भूमिका आपकी जेब पर कैसे असर डाल सकती है.
ADVERTISEMENT

न्यूज़ हाइलाइट्स
9 अक्टूबर को कुल भंडार 726.027 अरब डॉलर दर्ज हुआ
विदेशी मुद्रा संपत्ति में एक हफ्ते में 7.142 अरब डॉलर घटे
सोने के भंडार की कीमत 1.319 अरब डॉलर नीचे आई
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार पांच हफ्तों से गिरावट दर्ज की जा रही है. 4 सितंबर 2026 को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद 9 अक्टूबर को खत्म हुए सप्ताह तक इसमें करीब 60 अरब डॉलर की कमी आ चुकी है. यह गिरावट ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम एशिया में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और रुपये को लेकर भी दबाव की चिंता है.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 8.578 अरब डॉलर घटकर 726.027 अरब डॉलर रह गया. इससे पहले वाले सप्ताह में भी इसमें करीब 12.95 अरब डॉलर की कमी आई थी.
पांच हफ्तों में कितनी घटी भारत की विदेशी मुद्रा संपत्ति?
4 सितंबर 2026 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था. इसके बाद लगातार पांच सप्ताह तक इसमें गिरावट आई. इस तरह पांच हफ्तों में कुल 59.679 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई.
विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश के लिए वित्तीय सुरक्षा कवच की तरह होता है. जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल विदेशी भुगतान करने और रुपये में तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, भंडार में गिरावट का यह मतलब नहीं है कि देश के पास डॉलर खत्म हो रहे हैं या अर्थव्यवस्था अचानक कमजोर हो गई है. इसके पीछे की वजहों को समझना जरूरी है.
कच्चे तेल की कीमतें क्यों बढ़ा रही हैं दबाव?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है. चूंकि तेल की खरीद के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है, इसलिए डॉलर की मांग भी बढ़ सकती है. इससे रुपये पर दबाव आने की आशंका रहती है.
फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 110 डॉलर प्रति बैरल बताई जा रही है, जबकि फरवरी में पश्चिम एशिया संकट से पहले यह लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल थी. तेल की कीमतों में यह अंतर भारत के लिए अहम है, क्योंकि महंगे आयात से डॉलर की जरूरत बढ़ सकती है.
ऐसी स्थिति में RBI रुपये में तेज गिरावट को रोकने के लिए बाजार में डॉलर बेच सकता है. हालांकि, विदेशी मुद्रा भंडार में आई पूरी गिरावट को RBI की डॉलर बिक्री से जोड़ना सही नहीं होगा. भंडार में मौजूद दूसरी विदेशी मुद्राओं और सोने की कीमतों में बदलाव भी कुल आंकड़े को प्रभावित कर सकता है.
Foreign Currency Assets में सबसे ज्यादा गिरावट
विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा संपत्तियों यानी Foreign Currency Assets (FCA) का होता है. इसमें डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी मुद्राओं में रखी संपत्तियां भी शामिल हैं.
RBI के आंकड़ों के अनुसार, 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में FCA में 7.142 अरब डॉलर की कमी आई और यह घटकर 597.605 अरब डॉलर रह गया.
इन संपत्तियों की डॉलर में वैल्यू सिर्फ खरीद-बिक्री से नहीं बदलती. दूसरी मुद्राओं की डॉलर के मुकाबले कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भी इस आंकड़े पर पड़ सकता है.
सोने के भंडार की वैल्यू भी घटी
इसी सप्ताह भारत के सोने के भंडार की डॉलर में वैल्यू 1.319 अरब डॉलर घटकर 105.094 अरब डॉलर रह गई. लेकिन इसे RBI की ओर से सोना बेचने का प्रमाण नहीं माना जा सकता. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में बदलाव से भी भंडार की कुल वैल्यू ऊपर-नीचे हो सकती है.
इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट को समझते समय यह देखना जरूरी है कि कमी किस हिस्से में आई है और उसमें वास्तविक लेनदेन के साथ वैल्यूएशन में बदलाव की कितनी भूमिका है.
क्या आपकी जेब पर भी पड़ेगा असर?
अगर रुपये पर दबाव बना रहता है और डॉलर महंगा होता है, तो इसका असर आयात पर निर्भर क्षेत्रों पर पड़ सकता है. महंगे कच्चे तेल से परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है. इसका असर आगे चलकर कुछ वस्तुओं की कीमतों पर भी दिख सकता है.
इसके अलावा, विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा की तैयारी कर रहे लोगों को डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं. हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रुपये की चाल, कच्चे तेल की कीमतें और सरकार की नीतियां किस दिशा में जाती हैं.
फिलहाल भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 726 अरब डॉलर से ज्यादा है. इसलिए लगातार गिरावट पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन केवल इस आंकड़े के आधार पर किसी बड़े आर्थिक संकट का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा. आने वाले हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें, रुपये पर दबाव और RBI की संभावित बाजार कार्रवाई अहम संकेत होंगे.
