Silver Price Crash: $122 से गिरकर $60 पर पहुंची चांदी, क्या अब $100 का स्तर छूना मुश्किल? जानें निवेशकों को क्या करना चाहिए
चांदी की कीमत इस साल 122 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर से गिरकर करीब 60 डॉलर तक पहुंच गई है. आखिर चांदी में इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई? क्या अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका, मजबूत डॉलर और बढ़ती सप्लाई इसकी कीमतों पर दबाव बनाए रखेंगे?
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चांदी की कीमतों में आई तेज गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. पिछले कुछ समय में शानदार रिटर्न देने वाली चांदी अब भारी बिकवाली का सामना कर रही है. इस साल जनवरी में करीब 122 डॉलर प्रति औंस का रिकॉर्ड स्तर छूने के बाद चांदी की कीमत गिरकर करीब 60 डॉलर प्रति औंस तक आ गई. यानी कुछ ही समय में कीमत लगभग आधी रह गई है. इससे निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या चांदी दोबारा तेजी पकड़ पाएगी या अभी इसमें और गिरावट देखने को मिल सकती है?
चांदी हाल के कमोडिटी रैली के सबसे बड़े विजेताओं में शामिल रही थी. साल 2025 में इसकी कीमत में करीब 170 फीसदी की तेजी आई थी. इसके बाद जनवरी 2026 में भी चांदी करीब 71 फीसदी चढ़ गई. लेकिन रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद बाजार का रुख तेजी से बदल गया और निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी.
चांदी की कीमतों में गिरावट की 5 बड़ी वजहें
1. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका
चांदी की कीमतों पर दबाव की सबसे बड़ी वजह अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका है. बाजार में यह उम्मीद मजबूत हुई है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी कर सकता है.
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. इससे महंगाई बढ़ने की आशंका भी मजबूत हुई है. अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को बढ़ा सकते हैं. ऐसे माहौल में सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं में निवेश की आकर्षकता कम हो जाती है.
2. बॉन्ड यील्ड बढ़ने से चांदी पर दबाव
चांदी में निवेश करने पर कोई ब्याज या नियमित कमाई नहीं होती. इसके उलट सरकारी बॉन्ड और दूसरी फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज निवेशकों को ब्याज देती हैं.
जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों को अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्पों में बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद होती है. ऐसे में वे चांदी जैसे बिना ब्याज देने वाले निवेश से पैसा निकालकर बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले विकल्पों की ओर जा सकते हैं. इससे चांदी की मांग और कीमतों पर दबाव बढ़ता है.
3. अमेरिकी डॉलर की मजबूती
अमेरिका में ब्याज दरें और बॉन्ड यील्ड बढ़ने से डॉलर को भी मजबूती मिल सकती है. चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत डॉलर में तय होती है, इसलिए डॉलर मजबूत होने पर दूसरी करेंसी इस्तेमाल करने वाले खरीदारों के लिए चांदी महंगी हो जाती है.
इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की मांग कमजोर पड़ सकती है. HSBC के मुताबिक, मजबूत डॉलर और ऊंची बॉन्ड यील्ड चांदी की कीमतों में आगे की तेजी को सीमित कर सकते हैं.
4. सुरक्षित निवेश की मांग में कमी
अनिश्चितता के दौर में निवेशक अक्सर सोने और चांदी जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली संपत्तियों की ओर रुख करते हैं. लेकिन अगर महंगाई के कारण ब्याज दरें बढ़ने लगें, तो कीमती धातुओं के लिए माहौल मुश्किल हो सकता है.
मिडिल ईस्ट में तनाव और महंगे तेल ने बाजार में महंगाई की आशंका बढ़ाई है. इसके साथ ही ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों ने चांदी की सुरक्षित निवेश वाली अपील को कमजोर किया है.
5. चांदी की उपलब्धता में सुधार
चांदी की कीमतों में गिरावट की एक वजह फिजिकल सप्लाई का दबाव भी है. 2026 की दूसरी तिमाही में COMEX में रखे चांदी के बड़े स्टॉक का कुछ हिस्सा वापस लंदन के बाजार में आने लगा. इससे वहां चांदी की भौतिक उपलब्धता बढ़ी और सप्लाई की तंगी कम हुई.
क्या चांदी में अब और गिरावट आएगी?
ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक HSBC का मानना है कि चांदी की कीमत करीब 54 डॉलर प्रति औंस तक गिरने के बाद स्थिर होने की कोशिश कर रही थी. बैंक का नजरिया चांदी को लेकर हल्का सकारात्मक है, लेकिन उसे फिलहाल बहुत बड़ी तेजी की उम्मीद नहीं है.
HSBC के मुताबिक, आने वाले समय में चांदी की कीमतों को सोने से सपोर्ट मिल सकता है. अगर सोने की कीमतों में मजबूती बनी रहती है, तो इसका फायदा चांदी को भी मिल सकता है. हालांकि, औद्योगिक और ज्वेलरी मांग में कमजोरी चांदी की तेजी को सीमित कर सकती है.
चीन और भारत जैसे देशों में बड़े सिल्वर बार की संस्थागत खरीदारी से मांग को सहारा मिलने की उम्मीद है. सिक्कों और छोटे बार की मांग में भी धीरे-धीरे सुधार आ सकता है. इसके अलावा, इस साल की शुरुआत में जिन सिल्वर ETF से पैसा निकला था, उनमें दोबारा निवेश बढ़ रहा है.
लेकिन मजबूत अमेरिकी डॉलर और ऊंची ब्याज दरें चांदी के लिए बड़ी चुनौती बनी रह सकती हैं. अगर फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें बढ़ाने की आशंका गलत साबित होती है, तो चांदी की कीमतों में फिर तेजी आ सकती है.
चांदी की सप्लाई बढ़ने से कीमतों पर कितना असर होगा?
चांदी की कीमतों को प्रभावित करने वाला एक अहम पहलू इसकी सप्लाई भी है. आमतौर पर चांदी का बड़ा हिस्सा सोने और दूसरी बेस मेटल्स की माइनिंग के दौरान बाय-प्रोडक्ट के रूप में निकलता है. इसका मतलब है कि चांदी की कीमत बढ़ने पर भी कंपनियां तुरंत इसका उत्पादन नहीं बढ़ा सकतीं.
इसके अलावा, खदानों में अयस्क की गुणवत्ता घटने और कुछ खदानों के बंद होने से उत्पादन बढ़ाना चुनौतीपूर्ण रहता है. हालांकि, नई परियोजनाओं और मौजूदा खदानों की क्षमता बढ़ने से 2027 में चांदी का उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है.
चांदी की कीमतें मौजूदा स्तर पर रहने से माइनिंग कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन मिल रहा है. दूसरी तरफ, कीमतों में गिरावट की आशंका के कारण पुराने निवेशक अपनी चांदी बेच सकते हैं. इससे रीसाइक्लिंग के जरिए बाजार में सप्लाई बढ़ने की संभावना है.
चांदी का सप्लाई डेफिसिट तेजी से घटने का अनुमान
HSBC के मुताबिक, चांदी के बाजार में सप्लाई और मांग के बीच का अंतर तेजी से कम हो सकता है. बैंक के सप्लाई-डिमांड मॉडल और Silver Institute के 2026 सर्वे के आंकड़ों के आधार पर 2025 में चांदी का बाजार घाटा 140 मिलियन औंस रहने का अनुमान था.
HSBC का अनुमान है कि यह घाटा 2026 में घटकर सिर्फ 5 मिलियन औंस रह सकता है. 2027 में इसके थोड़ा बढ़कर 12 मिलियन औंस होने का अनुमान है.
इसका मतलब है कि चांदी की मांग और सप्लाई के बीच का अंतर काफी कम हो सकता है. ऐसे में कीमतों में बहुत बड़ी तेजी के लिए जरूरी सपोर्ट कमजोर पड़ सकता है.
हालांकि, 99.99 फीसदी शुद्धता वाली चांदी की लगातार कमी कीमतों को कुछ सहारा दे सकती है. लेकिन लंबे समय में बाजार में पहले से मौजूद चांदी के स्टॉक और बढ़ती रीसाइक्लिंग सप्लाई कीमतों में तेज उछाल को सीमित कर सकती है.
क्या चांदी फिर 100 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचेगी?
चांदी के निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इसकी कीमत दोबारा 100 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है?
HSBC को फिलहाल निकट भविष्य में चांदी के 100 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचने की उम्मीद नहीं है. बैंक के मुताबिक, मजबूत डॉलर, ऊंची बॉन्ड यील्ड, कमजोर औद्योगिक और ज्वेलरी मांग के साथ बढ़ती माइनिंग और रीसाइक्लिंग सप्लाई चांदी की कीमतों पर दबाव बनाए रख सकती है.
हालांकि, अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका खत्म होती है या भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता है, तो चांदी की कीमतों को सपोर्ट मिल सकता है. HSBC को 2027 में चांदी में सीमित तेजी की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल बड़ी रैली की संभावना कम दिखती है.
चांदी में निवेश को लेकर क्या है फंड मैनेजर की सलाह?
चांदी की कीमतों में आई गिरावट के बीच ICICI Prudential Mutual Fund के CIO और अनुभवी फंड मैनेजर शंकरन नरेन ने निवेशकों को एक अहम सलाह दी है.
ET Wealth Expo में उन्होंने कहा कि वह निवेशकों को बार-बार यह चेतावनी देते रहे हैं कि चांदी को ऐसा निवेश न समझें जिसकी कीमत हमेशा बढ़ती ही रहेगी.
नरेन ने चांदी की तुलना स्मॉलकैप शेयरों से की. उनके मुताबिक, जिस तरह स्मॉलकैप शेयरों में तेजी के साथ जोखिम भी ज्यादा होता है, उसी तरह चांदी में भी कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव का जोखिम है.
हालांकि, निवेशक अक्सर चांदी की औद्योगिक मांग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में इसके इस्तेमाल और सप्लाई की कमी जैसे कारण गिनाते हैं. उन्हें लगता है कि इन वजहों से चांदी की कीमत लगातार बढ़ती रहेगी. लेकिन नरेन के मुताबिक, किसी एसेट का पिछला शानदार प्रदर्शन भविष्य में भी उसी तरह के रिटर्न की गारंटी नहीं देता.
उन्होंने निवेश की एक अहम गलती को 'Anti-Asset Allocation' नाम दिया. इसका मतलब है कि निवेशक किसी एसेट में सिर्फ इसलिए पैसा लगाने लगते हैं क्योंकि उसने हाल के समय में शानदार रिटर्न दिया है.
नरेन के मुताबिक, असली एसेट एलोकेशन का मतलब है कि किसी एसेट की कीमत में गिरावट आने के बाद और उसके अलोकप्रिय होने पर उसमें निवेश के मौके तलाशना. यानी निवेश का फैसला सिर्फ पुरानी तेजी देखकर नहीं करना चाहिए.
निवेशकों को अब क्या करना चाहिए?
चांदी की कीमतों में आई बड़ी गिरावट के बाद निवेशकों को जल्दबाजी में फैसला लेने से बचना चाहिए. सिर्फ इस वजह से चांदी में निवेश करना सही नहीं होगा कि इसकी कीमत अपने रिकॉर्ड हाई से काफी नीचे आ गई है.
निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में सोने, चांदी, शेयर और डेट जैसे एसेट के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए. चांदी में निवेश करते समय अपनी जोखिम उठाने की क्षमता और निवेश की अवधि को ध्यान में रखना जरूरी है.
चांदी में सप्लाई की स्थिति, औद्योगिक मांग, अमेरिकी ब्याज दरों और डॉलर की चाल पर भी नजर रखनी होगी. फिलहाल HSBC का अनुमान है कि चांदी में तेज रैली के बजाय सीमित तेजी देखने को मिल सकती है. इसलिए निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे सिर्फ पिछला रिटर्न देखकर निवेश का फैसला न करें.
