बंदूक छोड़ पकड़ी फैशन की डोर, सुकमा की पूर्व नक्सली महिलाओं ने रैंप पर दिखाया जलवा, देखें Photos
कभी जंगलों में बंदूकें उठाने वाली सुकमा की 9 पूर्व नक्सली महिलाओं ने अब हिंसा छोड़ मुख्यधारा को अपना लिया है. रायपुर में पारंपरिक 'कोसा सिल्क' पहनकर की गई उनकी शानदार रैंप वॉक बदलते बस्तर और नए जीवन की नई तस्वीर बयां कर रही है.
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छत्तीसगढ़ के बीहड़ जंगलों में कभी जिनके हाथों में राइफलें होती थीं और जिनके खौफ से लोग कांप उठते थे, आज वही महिलाएं खूबसूरती और आत्मविश्वास की नई मिसाल पेश कर रही हैं. नक्सलवाद का खूनी रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटीं इन महिलाओं ने जब रंग-बिरंगे कपड़ों में रैंप पर कदम रखा, तो देखने वाले दंग रह गए. उनके चेहरे की मुस्कान और कातिलाना अदाएं अब सोशल मीडिया से लेकर हर जुबान पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं.

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यह अनोखा और ऐतिहासिक नज़ारा रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित राज्य स्तरीय बुनकर सम्मेलन में देखने को मिला. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के खास मौके पर सुकमा जिले की 9 पूर्व नक्सली महिलाओं ने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक 'कोसा सिल्क' और हैंडलूम से बने शानदार परिधान पहनकर कैटवॉक किया. जिस बस्तर को कभी सिर्फ खौफ के लिए जाना जाता था, वहां की बेटियों ने रैंप पर उतरकर यह साबित कर दिया कि मौका मिले तो वे हर मैदान फतह कर सकती हैं.

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इस खास कैटवॉक के लिए इन महिलाओं को कोई आम ट्रेनिंग नहीं मिली थी, बल्कि देश की फैशन राजधानी मुंबई से आए एक्सपर्ट्स ने इन्हें निधारा. लगातार 7 दिनों तक चले एक स्पेशल ग्रूमिंग सेशन में इन महिलाओं को रैंप वॉक, स्टेज प्रेजेंस और निडर होकर बोलने के गुर सिखाए गए. एक हफ्ते की कड़ी मेहनत का नतीजा यह रहा कि जब ये मंच पर आईं, तो उनका आत्मविश्वास किसी पेशेवर मॉडल से कम नहीं लग रहा था.

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इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और सरकार के कई बड़े मंत्री. उन्होंने तालियों के साथ इन सभी महिलाओं का हौसला बढ़ाया और उनसे सीधे बातचीत कर उनका मनोबल ऊंचा किया. नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि बंदूकों को नकार कर सिलाई और कढ़ाई के धागों से अपनी जिंदगी बुनना ही बस्तर का असली और सुनहरा भविष्य है.

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कभी नक्सली दस्ते में शामिल रही 'राजे' ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि जंगलों की जिंदगी किसी नरक से कम नहीं थी. हर वक्त सिर्फ मौत का डर सताता रहता था. हमेशा यह चिंता रहती थी कि झाड़ियों के पीछे से कब पुलिस की गोली आ जाए या कोई अनहोनी हो जाए. लेकिन सरेंडर करने के बाद जिंदगी पूरी तरह बदल गई है. अब न तो किसी का खौफ है और न ही कहीं भागने की मजबूरी, अब वे अपनी मर्जी की आजाद जिंदगी जी रही हैं.

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राजे और उनकी साथियों को सिर्फ कपड़ों की नुमाइश तक सीमित नहीं रखा जा रहा है, बल्कि सरकार उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने में जुटी है. पुनर्वास केंद्रों में इन महिलाओं को राजमिस्त्री (मैसनरी), ड्राइविंग और कई तरह के हुनर सिखाए जा रहे हैं. मकसद सिर्फ एक ही है कि ये महिलाएं स्वावलंबी बनें और समाज में सिर उठाकर सम्मान की जिंदगी बिता सकें.

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रायपुर का यह फैशन शो महज कपड़ों की कोई प्रदर्शनी नहीं था, बल्कि यह बदलते हुए छत्तीसगढ़ की एक जीवंत और खूबसूरत तस्वीर था. यह इस बात का सबूत है कि कैसे सही नीतियों और हौसले के दम पर हिंसा को विकास में और डर को विश्वास में बदला जा सकता है.

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सुकमा और बस्तर के जंगलों में आ रही यह शांति की बयार बयां कर रही है कि राज्य सरकार पुनर्वास की अपनी राह पर पूरी मजबूती से आगे बढ़ रही है.
