हरियाणा में 'हर्षद मेहता' स्टाइल स्कैम! सरकारी खजाने से 590 करोड़ की हेराफेरी, बैंक मैनेजर और उसकी टीम ने ऐसे रचा चक्रव्यूह
Haryana Scam News: हरियाणा में 590 करोड़ रुपये के सरकारी फंड घोटाले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. IDFC First Bank और AU Small Finance Bank में जमा सरकारी विभागों की राशि को कथित तौर पर बैंक मैनेजर और उसकी टीम ने फर्जी कंपनियों, जाली हस्ताक्षरों और निवेश के नाम पर दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिया. जानिए हरियाणा के इस हर्षद मेहता स्टाइल स्कैम की पूरी कहानी.

चंडीगढ़: हरियाणा में सरकारी फंड की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में जमा हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों का लगभग 590 करोड़ रुपया जालसाजों ने बड़ी चालाकी से दूसरे खातों में ट्रांसफर कर लिया. इस पूरे घोटाले का खुलासा तब हुआ जब विधानसभा में मुद्दा उठा और सरकार की घेराबंदी शुरू हुई. इसके बाद मामले की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) को सौंपी गई, जिसने अब इस सनसनीखेज धोखाधड़ी की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं.
रिभव ऋषि: बैंक मैनेजर से मास्टरमाइंड बनने का सफर
इस पूरे स्कैम का मुख्य सूत्रधार रिभव ऋषि नाम का व्यक्ति है, जो चंडीगढ़ के सेक्टर 32 स्थित आईडीएफसी बैंक की शाखा में मैनेजर के पद पर तैनात था. रिभव ने ही बैंक के भीतर रहते हुए सरकारी खातों से पैसा निकालने की पूरी योजना तैयार की थी. हैरानी की बात यह है कि करीब 6 महीने पहले उसने अपनी नौकरी छोड़ दी थी और घोटाले के पैसे से बेहद आलीशान जिंदगी जी रहा था. उसने अपने पद का फायदा उठाकर सिस्टम की खामियों को पहचाना और करोड़ों रुपये की चपत लगा दी.
रिश्तेदारी और फर्जी कंपनी का जाल
रिभव ने इस खेल में बैंक के ही एक रिलेशनशिप मैनेजर अभय को अपने साथ मिलाया. अभय का काम सरकारी अधिकारियों से संपर्क साधकर उन्हें बैंक में एफडी (FD) करवाने के लिए राजी करना था. इस साजिश को अंजाम देने के लिए अभय ने अपनी पत्नी स्वाति सिंगला और साले अभिषेक सिंगला को भी शामिल किया. स्वाति ने 'स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स' नाम से एक फर्जी कंपनी बनाई, जिसमें उसकी 75% हिस्सेदारी थी. सरकारी विभागों से निकलने वाला पैसा इसी फर्जी कंपनी के बैंक खातों में भेजा जाता था ताकि उसे सफेद दिखाया जा सके.
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शेयर मार्केट और प्रॉपर्टी में निवेश का 'फ्लॉप' प्लान
आरोपियों की कार्यप्रणाली (Modus Operandi) बिल्कुल 'स्कैम 1992' फिल्म जैसी थी. उनका इरादा सरकारी पैसे को अस्थायी रूप से शेयर बाजार और रियल एस्टेट में निवेश करना था. अभिषेक सिंगला इस पैसे के निवेश और फ्लो को संभाल रहा था. उनकी योजना थी कि निवेश से मिलने वाले भारी मुनाफे के बाद मूल रकम को वापस सरकारी खातों में डाल दिया जाएगा, जिससे किसी को शक न हो. हालांकि, इससे पहले कि वे अपना खेल पूरा कर पाते, विभाग को फंड गायब होने की जानकारी मिल गई और उनका यह 'फुल-प्रूफ' प्लान फेल हो गया.
रिटायर्ड IAS के फर्जी हस्ताक्षर और बड़ी लापरवाही
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों ने पंचायत विभाग के पूर्व डीजी और आईएएस अधिकारी डी.के. बोरा के फर्जी हस्ताक्षर का सहारा लिया. लगभग 12 से ज्यादा चेक और डेबिट नोट पर उनके जाली साइन कर 50 करोड़ रुपये एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में ट्रांसफर किए गए. चौंकाने वाली बात यह है कि श्री बोरा अक्टूबर 2025 में ही अपना पद छोड़ चुके थे, फिर भी उनके हस्ताक्षरों का इस्तेमाल होता रहा. जब भी खाते से पैसा निकलता था, तो विभाग के अधीक्षक प्रिंस के मोबाइल पर मैसेज जाता था, लेकिन इसके बावजूद समय रहते कोई कड़ा संज्ञान नहीं लिया गया.
अनसुलझे सवाल और अधिकारियों की भूमिका
फिलहाल एसीबी ने इन चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और सरकार का पैसा भी 24 घंटे के भीतर वापस आ गया है, जिसे मुमकिन है कि बैंक ने लौटाया हो. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने लंबे समय (अक्टूबर 2025 से अब तक) से चल रहे इस घोटाले की भनक विभाग के आला अधिकारियों को क्यों नहीं लगी? क्या यह केवल बैंक कर्मचारियों की साजिश थी या इसमें विभाग का भी कोई 'अंदरूनी' व्यक्ति शामिल था? फिलहाल जांच जारी है और आने वाले दिनों में कुछ बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है.
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