मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर बड़ा सियासी भूचाल! SC जाएगी BJP, सवर्ण VS OBC की जंग तेज़

मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण रद्द होने के बाद सियासी पारा चढ़ गया है. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ BJP सरकार और ओबीसी विधायक सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर करने जा रहे हैं. वहीं सड़क पर ओबीसी संगठन और परशुराम सेना आमने-सामने आ गए हैं. जानिए क्या हैं नए सियासी समीकरण ?

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Supreme Court, New Delhi
Pic- India Today
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भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत में एक बार फिर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का मुद्दा प्रचंड उबाल पर है. जबलपुर हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बाद से ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा यह संवेदनशील मामला अचानक दिल्ली से लेकर भोपाल तक राजनीतिक तापमान बढ़ा चुका है. ताजा अपडेट यह है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) अब इस कानूनी लड़ाई को सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ले जाने की पूरी तैयारी कर चुकी है.
राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करेगी, वहीं बीजेपी के ओबीसी विधायक खुद इस मामले में मुख्य पक्षकार (Intervenor) बनकर अपील दायर करेंगे. हालांकि, इस नए दांव-पेच के बीच राज्य में ‘सवर्ण बनाम ओबीसी’ का नया सामाजिक-राजनीतिक टकराव खड़ा हो गया है.

भोपाल में हाईलेवल बैठक, बीजेपी का 'मास्टरस्ट्रोक' ? 

भोपाल में सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के वरिष्ठ अधिकारियों और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद इस मामले ने नया मोड़ ले लिया. सूत्रों के मुताबिक, रणनीति के तहत पार्टी ने अपने प्रमुख ओबीसी विधायकों अरुण भीमावत और प्रदीप पटेल को तुरंत भोपाल बुलाया. बीजेपी की रणनीति साफ है कि Supreme Court में सिर्फ शासन ही नहीं, बल्कि बीजेपी के विधायक खुद अपनी ओर से याचिका दायर करेंगे.

क्यों जरूरी है सुप्रीम कोर्ट जाना?  

यदि मध्य प्रदेश सरकार इस केस से दूरी बना लेती, तो इसका मतलब होता कि उसे जबलपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला स्वीकार है. ऐसा होने पर 13% प्रोविजनल (होल्ड) लिस्ट से ओबीसी उम्मीदवारों को हटाकर अनारक्षित वर्ग (General Category) की सीटें भरनी पड़तीं, जिसके लिए हाईकोर्ट ने 3 महीने का वक्त दिया है. सरकार और पार्टी को उम्मीद है कि यदि सुप्रीम कोर्ट से स्टे (Stay) मिल जाता है, तो अंतिम फैसला आने तक प्रोविजनल लिस्ट यथावत बनी रहेगी.

 

 

सड़क पर संग्राम: OBC संगठनों ने फूंका बिगुल 

एक तरफ जहां कानूनी मोर्चे पर तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर विरोध की आग तेज हो गई है. ओबीसी महासभा ने पूरे प्रदेश में आंदोलन का ऐलान कर दिया है. 

  • 15 अक्टूबर से: प्रदेशव्यापी प्रदर्शन का पहला चरण शुरू हुआ, जिला मुख्यालयों पर ज्ञापन सौंपे गए.
  • 28 अक्टूबर: सभी संभाग स्तरों पर विशाल प्रदर्शन की घोषणा.
  • भोपाल में डेरा: राजधानी भोपाल में ओबीसी संगठनों ने प्रदर्शन किया. ओबीसी समाज के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर 27% आरक्षण का स्थायी कानूनी अमलीजामा पहनाने की मांग की है.

सवर्ण संगठनों की एंट्री: परशुराम सेना ने खड़े किए गंभीर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पेचीदा पहलू तब सामने आया जब सवर्ण वर्ग के संगठनों ने बीजेपी के इस कदम पर तीखा एतराज जताया. परशुराम सेवा संगठन ने सीधे तौर पर बीजेपी के फैसले की आलोचना करते हुए पार्टी के सवर्ण विधायकों को कटघरे में खड़ा कर दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी द्वारा ओबीसी विधायकों को आगे करके कानूनी लड़ाई लड़ने से पार्टी के भीतर और बाहर एक नया सामाजिक संतुलन का संकट खड़ा हो गया है. क्योंकि सवर्ण संगठनों का आरोप है कि वोट बैंक और सियासी फायदे के लिए राज्य के सामाजिक ताने-बाने को दांव पर लगाया जा रहा है.अब हालात ऐसे हैं कि बीजेपी के सवर्ण विधायकों के लिए अपने-अपने क्षेत्रों में संतुलन साधना मुश्किल हो रहा है, जिससे आंतरिक गुटबाजी का खतरा भी बढ़ गया है.

आगे क्या? कानूनी राहत या सामाजिक भूचाल?

मध्य प्रदेश का 27% ओबीसी आरक्षण अब महज एक अदालती मुकदमा नहीं रहा, बल्कि आगामी चुनावों की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा सियासी अखाड़ा बन चुका है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (SLP) और विधायकों की इंटरवेंशन याचिका की कानूनी चुनौती है, तो दूसरी तरफ OBC वर्ग की चेतावनी का भारी दबाव. इसके साथ ही परशुराम सेवा संगठन के विरोध ने इसे सवर्ण बनाम ओबीसी की एक बेहद संवेदनशील बहस में तब्दील कर दिया है. अब देखना यह होगा कि बीजेपी का यह कानूनी दांव अदालत में कितनी राहत दिला पाता है और सरकार जमीन पर उठ रहे इन सियासी तूफानों को कैसे थामती है.


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