शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद बचपन में कैसे थे? साथ में पढ़ाई करने वाले आचार्य ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद ने कैमरे पर बताई कई चौकाने वाली बातें, देखें वीडियो
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोपों के बीच उनके बचपन के सहपाठी आचार्य ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद ने मोर्चा खोल दिया है. एमपी तक से खास बातचीत में उन्होंने इन आरोपों को 'प्रतिष्ठा की हत्या' करार दिया और दावा किया कि आरोप लगाने वाले किसी नशे या साजिश के प्रभाव में हैं.

Swami Avimukteshwaranand controversy: सनातन धर्म के सर्वोच्च पदों में से एक, ज्योतिष पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इन दिनों एक बड़े विवादों के केंद्र में हैं. उन पर लगे गंभीर आरोपों और कोर्ट द्वारा एफआईआर के आदेश के बाद अब उनके समर्थन में उनके बचपन के साथी और ज्योतिश्वर आश्रम के वरिष्ठ आचार्य ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद सामने आए हैं. उन्होंने एक निजी समाचार चैनल 'एमपी तक' को दिए इंटरव्यू में कई चौंकाने वाले दावे किए और इस पूरे घटनाक्रम को सनातन धर्म के खिलाफ एक बड़ी साजिश करार दिया.
"जमानत मिलना सिर्फ अंतरिम राहत, अब आर-पार की लड़ाई"
आचार्य ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद ने बातचीत के दौरान स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली अंतरिम राहत केवल एक शुरुआत है. उन्होंने कहा, "हमें जमानत मिलने से संतोष नहीं है. यह एक महापुरुष की प्रतिष्ठा की हत्या करने का प्रयास है. कानून में प्रतिष्ठा की हानि को हत्या से भी बड़ा अपराध माना जाना चाहिए. अगर आशुतोष ब्रह्मचारी के दावे झूठे पाए जाते हैं, तो उन पर धारा 302 (हत्या का प्रयास) के तहत कार्रवाई होनी चाहिए."
आरोपों की प्रामाणिकता पर उठाए सवाल
शंकराचार्य के सहपाठी ने एफआईआर के आदेश पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि जिस समय और घटनाक्रम का जिक्र किया जा रहा है, वह कहीं से भी मेल नहीं खाता. उन्होंने आरोप लगाया कि जो बटुक (शिष्य) आरोप लगा रहे हैं, वे न तो कभी वहां पढ़ते थे और न ही उनका आश्रम से वैसा कोई संबंध था. उन्होंने तीखा हमला करते हुए कहा, "ऐसा लगता है जैसे आशुतोष ब्रह्मचारी और उनके बटुक किसी नशे (ड्रग्स) के प्रभाव में हैं या किसी उन्माद में अनर्गल बातें कर रहे हैं. उनकी बुद्धि काम नहीं कर रही है."
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बचपन से ओजस्वी और मेधावी रहे हैं महाराज
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ संपूर्णानंद विश्वविद्यालय में छः सात वर्षों तक शिक्षा ग्रहण करने वाले आचार्य ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि महाराज जी बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने छात्र संघ चुनाव लड़ा और विभिन्न शास्त्रों में निपुणता हासिल की. उनके 'क्रोधी' स्वभाव के सवाल पर आचार्य ने कहा कि वे क्रोधी नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ तेज हैं. उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जैसे परशुराम का क्रोध सृजन के लिए था, वैसे ही महाराज श्री का व्यवहार अन्याय के विरुद्ध उग्र होना एक सज्जन पुरुष का लक्षण है.
धर्मसत्ता और राजसत्ता के बीच संतुलन की जरूरत
आचार्य ने इस विवाद को धर्म और संविधान के बीच की खाई से जोड़ते हुए कहा कि आज धर्म को किनारे करके संविधान को श्रेष्ठ बताने की कोशिश हो रही है, जबकि दोनों की अपनी जगह श्रेष्ठता है. उन्होंने कहा कि "संविधान तलवार है तो धर्म सुई है", दोनों ही समाज के लिए आवश्यक हैं.
वर्तमान में यह मामला कानूनी पेचीदगियों में फंसा हुआ है, लेकिन शंकराचार्य के समर्थकों का मानना है कि यह ज्योतिष पीठ की गरिमा को धूमिल करने का एक संगठित प्रयास है. अब देखना यह है कि न्यायालय में 'दूध का दूध और पानी का पानी' कब तक होता है.










