भारत के केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों और दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिमों को लेकर अहम बात कही है. Bloomberg New Economy Forum की एक चर्चा में उन्होंने कहा कि ऐसे समय भी आते हैं, जब दोस्त दुश्मन बन जाते हैं. इसलिए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और उत्पादन व्यवस्था को इस तरह मजबूत करना होगा कि वो दूसरे देशों की नीतियों में बदलाव से कमजोर न पड़े. इस चर्चा में Cisco के CEO चक रॉबिंस भी शामिल हुए. बातचीत का मुख्य विषय था कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल में देश दूसरे देशों और कंपनियों के साथ भरोसे, साझेदारी और रणनीतिक गठबंधन को किस तरह देखें. वैष्णव ने भारत की लंबी पारी योजना का जिक्र करते हुए बताया कि देश को केवल तात्कालिक जरूरतों के आधार पर नहीं, बल्कि अगले 20 से 25 साल को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए. उनकी टिप्पणी ऐसे दौर में आई है, जब वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन, तकनीक, विनिर्माण और रणनीतिक संसाधनों को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है. ऐसे माहौल में घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जोखिम कम करना आर्थिक और रणनीतिक योजना का अहम हिस्सा बन गया है. > इसलिए हमें लगातार अपने नज़रिए को बदलना और ठीक करना पड़ता है. और हम भारत में कम से कम 20 साल आगे की सोच रहे हैं. हम ऐसे लक्ष्यों पर विचार कर रहे हैं जो तीन से पाँच साल के शॉर्ट-टर्म लक्ष्य हैं, पाँच से 15 साल के मिड-टर्म लक्ष्य हैं, और 20 से 25 साल के लॉन्ग-टर्म लक्ष्य हैं. हम इसी तरह सोच रहे हैं. और हम बहुत ही व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रहे हैं. क्योंकि हाँ, आप सही कह रहे हैं. ऐसे समय भी आते हैं जब दोस्त दुश्मन बन जाते हैं. इसलिए मज़बूत आधार बनाना बहुत ज़रूरी है. - अश्विनी वैष्णव वहीं इस बातचीत में Cisco के CEO चक रॉबिंस ने कहा कि देशों को रणनीतिक साझेदारी करते समय ये समझना चाहिए कि वे किस पर भरोसा कर सकते हैं. हालांकि, भरोसे के साथ अपनी क्षमताओं में लचीलापन बनाए रखना भी जरूरी है. रॉबिंस ने कहा कि किसी साझेदार का चयन करते समय केवल ये देखना पर्याप्त नहीं है कि वो किस देश से आता है. ये भी देखना चाहिए कि संबंधित कंपनी किस तरह काम करती है, वो कितने समय से देश में निवेश कर रही है और उसने पहले किए गए वादों को कितना पूरा किया है. इस बातचीत में साफ तौर पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नाम तो किसी देश का नहीं लिया लेकिन यकीनन हाल के दिनों में अमेरिका ने जिस तरह भारत को लेकर रूख अपनाया, कुछ बयान दिए, ट्रेड डील में या फिर टैरिफ के मामले में जो मनमान रुख अपनाया उसको लेकर भारत और अमेरिका के रिश्तों में असर साफ दिखाई दे रहा है.