रूसी तेल पर भारत-चीन को घेरना चाहता था अमेरिका, यूरोप ने दिया झटका
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, यूरोप ने रूस से तेल खरीदने पर भारत और चीन के खिलाफ सेकेंडरी टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव को ठुकरा दिया. जानिए 60 दिन की छूट और भारत पर इसके असर की पूरी जानकारी.
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न्यूज़ हाइलाइट्स
भारत-चीन पर टैरिफ चाहता था अमेरिका, यूरोप का इनकार
रूसी तेल पर भारत को राहत, अमेरिका ने रोके टैरिफ
भारत-चीन पर प्रतिबंध लगाने से यूरोप ने किया इनकार
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर सेकेंडरी टैरिफ लगाने में साथ देने का आग्रह किया था, लेकिन यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. बेसेंट ने यह बात NBC के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में कही. उनके बयान के मुताबिक, अमेरिका चाहता था कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए सहयोगी देश भी साझा कदम उठाएं.
स्कॉट बेसेंट ने क्या कहा?
बेसेंट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने 2026 के वसंत में यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन के खिलाफ सेकेंडरी टैरिफ लगाने की अपील की थी. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दूसरे देश इस प्रयास में शामिल नहीं होते, तो रूस पर आर्थिक दबाव बनाने का बोझ केवल अमेरिका ही क्यों उठाए.उनके बयान का मुख्य संदेश यह था कि रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को सीमित करने के लिए अमेरिका अपने सहयोगियों की साझा कार्रवाई चाहता है. हालांकि, यूरोपीय देशों की ओर से इस प्रस्ताव को ठुकराने के पीछे के कारणों पर सभी संबंधित सरकारों का विस्तृत आधिकारिक पक्ष इस बयान से स्पष्ट नहीं होता.
यूरोप पर रूस को ऊर्जा से कमाई कराने का आरोप
स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों पर रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीद जारी रखने को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि अमेरिका लगभग 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें करीब 1.8 अरब डॉलर के उर्वरक शामिल हैं. उनके अनुसार, यूरोप का रूसी उत्पादों का आयात अमेरिकी आयात से 10 गुना से भी अधिक है. बेसेंट ने यह भी आरोप लगाया कि यूरोपीय देशों की रूसी ऊर्जा खरीद से मॉस्को को आर्थिक संसाधन मिलते हैं, जिनका इस्तेमाल रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान किया जा सकता है. ये आंकड़े और आरोप अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर आधारित हैं; इन्हें यूरोपीय ऊर्जा व्यापार के स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
यमल से आने वाली LNG खेपों का भी किया जिक्र
बेसेंट ने रूस की यमल LNG सुविधा से भेजी गई खेपों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि साल के शुरुआती छह महीनों में कुल 140 कार्गो में से 136 यूरोपीय देशों तक पहुंचे. उनके अनुसार, इन खेपों का मूल्य 8 अरब डॉलर से अधिक था. उन्होंने बेल्जियम, स्पेन, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों का नाम लेते हुए यूरोप की ऊर्जा खरीद पर सवाल उठाया. इस दावे का उद्देश्य यह दिखाना था कि रूस की ऊर्जा पर आर्थिक निर्भरता केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है. हालांकि, कार्गो की संख्या, गंतव्य और कुल मूल्य को स्वतंत्र व्यापार आंकड़ों से अलग से सत्यापित करना जरूरी है.
रूसी डीजल और जेट फ्यूल पर भी उठाए सवाल
अमेरिकी वित्त मंत्री ने यूरोपीय देशों की ऊर्जा नीतियों की आलोचना करते हुए रूसी डीजल और जेट फ्यूल से जुड़े प्रतिबंधों का भी उल्लेख किया. उन्होंने दावा किया कि मई में कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई थी और ब्रिटेन सहित यूरोपीय देशों की नीतियों पर सवाल उठाए. इस मुद्दे पर प्रतिबंधों की वास्तविक स्थिति, लागू होने की तारीख और किन उत्पादों या व्यापार मार्गों पर नियम लागू थे, इसकी पुष्टि संबंधित सरकारी आदेशों से करना जरूरी है.
ट्रंप प्रशासन ने 60 दिनों के लिए क्यों दी राहत?
रूस से जुड़े प्रतिबंधों और रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित टैरिफ के बीच ट्रंप प्रशासन ने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 के तहत कुछ प्रावधानों पर अस्थायी छूट दी है. इस कदम को 60 दिनों की समीक्षा अवधि के रूप में पेश किया गया है, ताकि प्रस्तावित प्रतिबंधों और टैरिफ के वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया जा सके. बेसेंट ने स्पष्ट किया कि कोई प्रतिबंध हटाए नहीं गए. प्रशासन का कहना है कि यह कदम आगे की कार्रवाई पर फैसला लेने से पहले स्थिति का आकलन करने के लिए है. इसलिए इस छूट को सभी रूस-संबंधी प्रतिबंधों के स्थायी अंत के रूप में समझना सही नहीं होगा.
मार्को रुबियो ने भारत को बताया महत्वपूर्ण सहयोगी
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी 60 दिनों की समीक्षा अवधि का समर्थन करते हुए कहा कि राष्ट्रपति यह समझना चाहते हैं कि प्रतिबंध और टैरिफ लगाने से वैश्विक तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा. रुबियो ने भारत का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन रूसी तेल पर निर्भरता तुरंत समाप्त करना आसान नहीं है. उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार भी बताया. उनके बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन रूस पर दबाव बनाने की नीति के साथ-साथ ऊर्जा बाजार की वास्तविकताओं और भारत के साथ संबंधों को भी ध्यान में रख रहा है.
भारत पर संभावित टैरिफ का खतरा कितना बड़ा था?
रूसी तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ प्रस्तावित अमेरिकी कानून भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक चिंता का विषय था. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहम एक्ट के तहत भारत के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की संभावना थी. हालांकि, ट्रंप प्रशासन की हालिया छूट ने इन प्रावधानों के तत्काल लागू होने पर विराम लगाया है. भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातकों में शामिल है और अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदता है. रूस से तेल खरीद में बदलाव का असर आयात लागत, रिफाइनरी संचालन, ईंधन कीमतों और व्यापार संबंधों पर पड़ सकता है. इसलिए भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है.
भारत की ऊर्जा सुरक्षा क्यों है अहम?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमत, उपलब्धता और भुगतान की शर्तें देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. रूसी तेल की खरीद में अचानक बदलाव होने पर वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से तेल जुटाने, परिवहन व्यवस्था बदलने और लागत का आकलन करने की जरूरत पड़ सकती है. दूसरी ओर, अमेरिका और उसके सहयोगियों की रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की नीति भी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार को प्रभावित कर सकती है. भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करते हुए बदलते प्रतिबंधों, टैरिफ और कूटनीतिक परिस्थितियों के बीच अपने आर्थिक हितों की रक्षा करे.
60 दिनों की समीक्षा पर टिकी नजरें
ट्रंप प्रशासन की ओर से दी गई अस्थायी छूट के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण प्रतिबंधों और टैरिफ के प्रभावों की समीक्षा है. इस अवधि में ऊर्जा बाजार, वैश्विक आपूर्ति, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ संबंधों से जुड़े पहलुओं का आकलन किया जा सकता है. हालांकि, अंतिम निर्णय क्या होगा और भारत तथा चीन पर भविष्य में कोई अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. यूरोपीय सहयोगियों के साथ समन्वय और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता भी आगे की स्थिति को प्रभावित कर सकती है.
स्कॉट बेसेंट का बयान रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के दृष्टिकोण में अंतर को सामने लाता है. अमेरिका भारत और चीन पर दबाव बनाने के लिए साझा कार्रवाई चाहता था, लेकिन बेसेंट के अनुसार यूरोप ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. वहीं, 60 दिनों की अस्थायी छूट से भारत के लिए तत्काल टैरिफ संबंधी अनिश्चितता कम हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिति आगे के अमेरिकी फैसलों पर निर्भर करेगी. आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार वार्ता और रूस पर प्रतिबंधों की नीति इस मुद्दे के प्रमुख पहलू बने रहेंगे.
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