अमेरिका में जीत, UP में सियासत गर्माई, कौन हैं पहले मुस्लिम सीनेटर अब्दुल अल-सैयद और क्या है उनका भारत कनेक्शन?

अमेरिका के मिशिगन से पहले मुस्लिम सीनेटर बनकर इतिहास रचने वाले अब्दुल अल-सैयद की भारतीय कनेक्शन वाली जीत ने भारत की राजनीति में हलचल मचा दी है.

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 अब्दुल अल-सैयद
अब्दुल अल-सैयद
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Charchit Chehra: क्या सात समंदर पार, सुपरपावर अमेरिका में हुई एक चुनावी जीत से उत्तर प्रदेश की राजनीति का रुख बदल सकता है?  इस समय देश और दुनिया की राजनीति में एक ही नाम गूंज रहा है- अब्दुल अल-सैयद! अमेरिका के मिशिगन में इस 42 साल के अब्दुल ने वो इतिहास रच दिया है, जिसने भारत में लखनऊ से लेकर हैदराबाद तक की सियासत में 'भूचाल' ला दिया है.

यूपी की रैलियों में कल तक जिस 'अब्दुल' को दरी बिछाने और पंक्चर बनाने का ताना दिया जाता था, आज उस 'अब्दुल' का नाम अमेरिकी सीनेट की बुलंदियों पर लिखा जा चुका है. हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस अमेरिकी जीत को लपकते हुए यूपी के 'अब्दुल' को जगाने का बिगुल फूंक दिया है! आखिर कौन है 'ग्लोबल चर्चित चेहरा अब्दुल', क्या है उनका भारत कनेक्शन?

अब्दुल की इतनी चर्चा इसलिए कि अमेरिका के मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के अब्दुल अल-सैयद ने मिशिगन से ऐतिहासिक जीत हासिल की है. वह अमेरिकी इतिहास में सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं. उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के दिग्गज उम्मीदवार और पूर्व FBI एजेंट माइक रोजर्स को करारी शिकस्त दी है. डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के इस मजबूत गढ़ को ढहाने के बाद से ही दुनिया भर के मीडिया में अब्दुल अल-सैयद छाए हुए हैं. उनका एजेंडा बेहद प्रगतिशील रहा है, जिसमें उन्होंने कॉरपोरेट ताकतों के खिलाफ आम अमेरिकी परिवारों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवा और महंगाई कम करने जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ा.

मेयर जोहरान ममदानी से की जाती है तुलना 

अब्दुल अल-सैयद की इस जीत की तुलना अक्सर न्यूयॉर्क के तेजतर्रार मेयर जोहरान ममदानी से की जा रही है. जोहरान ममदानी ने भी इसी तरह प्रोग्रेसिव यानी प्रगतिशील राजनीति के दम पर अपनी बड़ी पहचान बनाई है. जब अब्दुल चुनावी मैदान में थे, तब अमेरिकी मीडिया उन्हें 'दूसरा ममदानी' या 'मिनी ममदानी' कहकर बुला रहा था. खुद ममदानी ने अब्दुल अल-सैयद की इस शानदार जीत को अमेरिका की राइटविंग के खिलाफ बड़ा जनमत संग्रह बताया है. 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जैसे कभी ममदानी को पसंद नहीं किया वैसे अब्दुल अल-सैयद भी पसंद नहीं थे. उन्होंने अब्दुल को "जिहादी", "कट्टरपंथी", "मुस्लिम ब्रदरहुड का सदस्य" और "नफ़रत फैलाने वाला इंसान" तक कह डाला. ट्रंप ने यह दावा भी किया कि अब्दुल जैसे लोग देश को बर्बाद कर देंगे. ट्रंप के इस भीषण विरोध और राइट विंग के दुष्प्रचार के सामने अब्दुल अकेले नहीं थे; उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी का सबसे मजबूत साथ मिला. दिग्गज नेताओं ने न केवल अब्दुल के लिए प्रचार किया बल्कि करोड़ों देकर मुकाबला करने का सपोर्ट दिया.  पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस के अब्दुल के समर्थन में खुलकर मैदान में आने से अब्दुल अल सैयद के लिए चुनाव आसान बन गया. 

अब्दुल अल-सैयद का जन्म 31 अक्टूबर 1984 को अमेरिका के मिशिगन (रोचेस्टर हिल्स) में हुआ. पिता मोहम्मद अल-सैयद मिस्र के रहने वाले थे जो नौकरी के सिलसिले में अमेरिका में आकर बस गए. उसी से अब्दुल का जन्म अमेरिका में हुआ. अब्दुल अल-सैयद का जन्म भले ही अमेरिका के मिशिगन में हुआ हो, लेकिन उनकी जड़ें बेहद संघर्षों से भरी हैं. उनके दादा मिस्र (Egypt) के अलेक्जेंड्रिया शहर में आम सब्जी बेचने वाले थे. उनके पिता, मोहम्मद अल-सैयद, वहां से पढ़ाई करने अमेरिका आए और उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. अब्दुल जब बेहद छोटे थे, तभी उनके माता-पिता मोहम्मद अल-सैयद और फातेन एलकोमी का तलाक हो गया. मां उनसे दूर मिसौरी चली गईं और वह अपनी सौतेली मां जैकलीन की देखरेख में पले-बढ़े. दिलचस्प बात यह है कि अब्दुल की सौतेली मां जैकी एक पारंपरिक अमेरिकी ईसाई परिवार से थीं. ऐसे में अब्दुल का बचपन मल्टीकल्चर माहौल में बीता.

 मुस्लिम सीनेटर बनकर इतिहास रचने वाले अब्दुल 

अमेरिका के इतिहास में पहले मुस्लिम सीनेटर बनकर इतिहास रचने वाले अब्दुल की कहानी केवल राजनीति और भाषणों तक सीमित नहीं है. इस 'ग्लोबल अब्दुल' के पीछे एक ऐसी फिल्मी और दिलचस्प लव स्टोरी है, जो सात समंदर पार से सीधे भारत के कर्नाटक से आकर जुड़ती है. मिस्र के अब्दुल, अमेरिका में चुनाव जीतने वाले अब्दुल का गहरा भारतीय कनेक्शन है. पत्नी डॉ. सारा जकाकू भारतीय मूल की हैं. कर्नाटक के भटकल गांव में उनका मायका है. इस तरह से भटकल के दामाद हैं अब्दुल अल सैयद.  खुद अब्दुल गर्व से कहते हैं कि 20 साल से एक भारतीय परिवार का दामाद रहने के बाद वह 'अरब से ज्यादा खुद को भारतीय' महसूस करने लगे हैं! 

अब्दुल की जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब वे साल 2003 में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में पढ़ने गए. वहां उनकी मुलाकात सारा जुकाकू से हुई, जो उसी यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी की पढ़ाई कर रही थीं. सारा एक भारतीय-अमेरिकी मुस्लिम परिवार से थीं. दोनों कॉलेज के 'मुस्लिम स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (MSA) में सक्रिय थे. अब्दुल को सारा से पहली ही नजर में प्यार हो गया था. अब्दुल ने बाद में एक इंटरव्यू में कबूला था कि 'जिस दिन मैं सारा से मिला, मुझे उसी पल पता चल गया था कि मैं इसी लड़की से शादी करना चाहता हूं'.

जब अब्दुल ने कॉलेज के पहले ही साल में सारा को शादी के लिए प्रपोज किया, तो सारा बेहद हैरान थीं. सारा ने उनसे कहा कि वे दोनों अभी बहुत छोटे हैं, इस पर अब्दुल का खूबसूरत जवाब था-"हम अभी बहुत छोटे हैं तो क्यों न हम दोनों एक साथ बड़े हों और साथ में आगे बढ़ें? दोनों ने परिवार की रजामंदी ली और मई 2006 में शादी के बंधन में बंध गए. 
अब्दुल की पत्नी डॉ. सारा जुकाकू सायकियाट्रिस्ट यानी मनोरोग विशेषज्ञ हैं.

अब्दुल और सारा की जोड़ी को अमेरिका में एक 'पावर कपल' माना जाता है. आज इस कपल की दो बेहद प्यारी बेटियां हैं- एमाली (Emmalee) और सेरीन (Serene). चुनावी रैलियों में सारा अक्सर स्टेज पर आकर कहती हैं कि "मिशिगन के लोगों को अब्दुल जैसा लड़ाका चाहिए, क्योंकि जो इंसान मेरे और मेरे बच्चों के लिए खड़ा रहता है, वो अमेरिका की जनता के लिए भी वैसे ही लड़ेगा."

सारा के दादा, जे.एच. शम्सुद्दीन जुकाकू, कर्नाटक तब के मैसूर राज्य की राजनीति का एक बड़ा नाम थे. मुख्यमंत्री बी.डी. जत्ती की सरकार में वित्त उप-मंत्री (Deputy Minister for Finance) रह चुके थे. वे भटकल क्षेत्र के पहले वकील भी थे और उन्होंने ही उस इलाके में पहली बार बिजली लाने का काम किया था. सारा के पिता, डॉ. तय्यब जुकाकू किडनी रोग विशेषज्ञ (Nephrologist) हैं, जिन्होंने बेंगलुरु से अपनी MBBS की पढ़ाई की और 1980 के दशक में अमेरिका शिफ्ट हो गए. भले ही सारा अमेरिका में पैदा हुईं, लेकिन उनके पिता हर साल उन्हें भटकल और बेंगलुरु अपने दादा-दादी के घर लाते थे ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़ी रहें.

अब्दुल ने मिशिगन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. इसके बाद, दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित 'रोड्स स्कॉलर' (Rhodes Scholar) के रूप में उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पब्लिक हेल्थ में डॉक्टरेट (Ph.D.) की डिग्री ली. फिर उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल की डिग्री (M.D.) हासिल की. डॉक्टर और महामारी वैज्ञानिक (Epidemiologist) बनने के बाद अब्दुल ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर पढ़ाया. 2015 में, केवल 30 साल की उम्र में, वह डेट्रायट शहर के सबसे युवा हेल्थ डायरेक्टर बने. उन्होंने वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारा. इतना सब करने के बाद राजनीति में आए. साल 2018 में उन्होंने मिशिगन के गवर्नर पद के लिए प्राइमरी चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इस हार के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी; उन्होंने किताबें लिखीं, टीवी पर डिबेट की और अपना मशहूर पॉडकास्ट चलाया. साल 2026 में वे सीनेट की रेस में उतरे.

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी गदगद हो गए

मिशिगन में अब्दुल जीते, तो भारत में AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी गदगद हो गए. ओवैसी ने तुरंत सोशल मीडिया और रैलियों में बयान जारी किया- एक अब्दुल मिशिगन में जीत गया, अब यूपी के अब्दुल को जागना होगा. ओवैसी के इस शोर के पीछे एक गहरा सियासी मैसेज है. मुस्लिम समाज को यह समझा रहे हैं कि 'अब्दुल' शब्द कोई तंज या ताना नहीं है. बीजेपी और संघ परिवार पर निशाना साध रहे हैं, जो कथित रूप से 'अब्दुल' शब्द का इस्तेमाल पंक्चर बनाने वाले के रूप में करते हैं. ओवैसी का सबसे बड़ा हमला समाजवादी पार्टी पर है. वह मुस्लिम मतदाताओं को संदेश दे रहे हैं कि सेक्युलर पार्टियों के लिए 'दरी बिछाना यानी भीड़ जुटाना और सिर्फ वोट बैंक बने रहना बंद करो. जब अमेरिका में अब्दुल सीनेटर बन सकता है, तो यूपी का अब्दुल सिर्फ दरी क्यों बिछाए, वह खुद नेता और विधायक क्यों न बने? ओवैसी समाजवादी पार्टी के साथ मजबूत अलायंस की ताक में हैं. बयानबाजी के जरिए सपा को रगड़कर ये एहसास कर रहे हैं कि मुसलमानों को कम मत आंकना. 

सवाल तो बनता है कि एक मिस्री परिवार का बेटा अब्दुल अमेरिका के इतने बड़े पद पर कैसे पहुंच गया? अमेरिकी संविधान के तहत सीनेटर बनने के लिए केवल तीन बुनियादी शर्तें जरूरी हैं. उम्मीदवार की उम्र कम से कम 30 साल होनी चाहिए. कम से कम 9 साल से अमेरिका का नागरिक हो और उसी राज्य का निवासी हो जहां से चुनाव लड़ रहा है. चूंकि अब्दुल का जन्म अमेरिका में ही हुआ  इसलिए वे जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं. अमेरिकी कानून राष्ट्रपति पद को छोड़कर बाकी सभी राजनीतिक पदों जैसे सीनेटर, गवर्नर या मेयर के लिए किसी भी मूल के अमेरिकी नागरिक को समान रूप से चुनाव लड़ने और जीतने का पूरा अधिकार देता है.

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