Shesh Bharat: ईसाई सीएम विजय की क्यों हाईकोर्ट ने तारीफ की? कैसे धर्म की दीवारें तोड़ समावेशी बन रहे थलापति?

Shesh Bharat: मद्रास हाईकोर्ट ने ईसाई मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा मीनाक्षी मंदिर के नियमों का सम्मान करते हुए लिखित श्रद्धा प्रकट करने की सराहना की है, जो उनकी समावेशी राजनीति और धार्मिक सद्भाव को दर्शाता है.

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विजय थलापति
विजय थलापति
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क्या कोई नेता अपनी आस्था को बदले बिना दूसरे धर्म के पवित्र स्थल में सच्ची श्रद्धा दिखा सकता है? राजनीति के मंच पर अक्सर धर्म को 'वोट बैंक' का जरिया बनाया जाता है, लेकिन तमिलनाडु के ईसाई सीएम सी जोसेफ विजय ने कुछ ऐसा किया जिसने मद्रास हाई कोर्ट तक को तारीफ करने पर मजबूर कर दिया. विजय का ईसाई होना, चुनाव के समय चर्च जाना और फिर मीनाक्षी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना, तमिलनाडु में इसकी दिलचस्प राजनीतिक गाथा चल रही है.

इस पूरी कहानी को समझने के लिए सबसे पहले सीएम विजय के पारिवारिक बैकग्राउंड को जानना जरूरी है. विजय का पूरा नाम सी. जोसेफ विजय है. उनके पिता एस.ए. चंद्रशेखर एक ईसाई फिल्म निर्देशक हैं, जबकि उनकी मां शोभा चंद्रशेखर एक हिंदू और मशहूर गायिका हैं. विजय खुद को एक 'फर्म बिलीवर' भगवान में अटूट विश्वास रखने वाला बताते हैं. उन्होंने अपनी मां की इच्छा के लिए बकायदा एक 'साईं बाबा मंदिर' का निर्माण भी करवाया था, लेकिन कागजों पर और व्यक्तिगत पहचान के तौर पर वे ईसाई धर्म को मानते हैं. यही वजह है कि उनकी इस दोहरी सांस्कृतिक विरासत पर विरोधी अक्सर सवाल उठाते रहे हैं.

2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव विजय के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे, क्योंकि नई नवेली पार्टी टीवीके (TVK) के साथ पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा था. चुनाव प्रचार के दौरान जब वे त्रिची (Tiruchirappalli) पहुंचे, तो एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने खूब सुर्खियां बटोरीं. विजय सेंट एंटनी चर्च (St. Antony's Church) के अंदर गए और घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना करने लगे. इसे लेकर विरोधियों ने उन पर 'माइनॉरिटी कार्ड' खेलने का आरोप लगाया.

चुनाव आयोग से शिकायत भी हुई कि विजय चर्च में अपनी पार्टी का शॉल पहनकर आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं. चुनाव के इस दौर में वह पूरी तरह से एक ईसाई नेता के रूप में पेश आ रहे थे.

गर्भगृह में जाकर पूरे विधि-विधान से दर्शन किए

चुनाव खत्म हुए, नतीजे आए और जोसेफ विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए. मुख्यमंत्री बनने के बाद सितंबर के महीने में वे मदुरै के ऐतिहासिक और बेहद पवित्र मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर के दौरे पर गए. अब चुनौती बड़ी थी, क्योंकि मीनाक्षी मंदिर के आगम (पारंपरिक) नियमों के मुताबिक, किसी भी गैर-हिंदू का मंदिर के मुख्य ध्वज-स्तंभ (कोडीमराम) से आगे जाना वर्जित है, जब तक कि वह भगवान में अपनी आस्था का लिखित प्रमाण न दे. विरोधी इस इंतजार में थे कि क्या ईसाई मुख्यमंत्री इस नियम के आगे झुकेंगे या फिर वे मंदिर के नियमों को दरकिनार करेंगे? लेकिन विजय ने सबको चौंकाते हुए मंदिर के रजिस्टर पर दस्तखत किए और लिखित शपथ-पत्र (Faith Undertaking) दिया कि वे माता मीनाक्षी पर अटूट श्रद्धा रखते हैं. इसके बाद उन्होंने गर्भगृह में जाकर पूरे विधि-विधान से दर्शन किए.

यह मामला शांत हो ही रहा था कि मद्रास हाई कोर्ट में कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ एक याचिका दायर हुई, जो मुस्लिम या ईसाई होते हुए भी बिना किसी नियम के मंदिर के शिखरों पर चढ़ रहे थे या राजनीतिक फायदे के लिए धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहे थे. कोर्ट ने इस 'पॉलिटिकल ड्रामा' पर सख्त नाराजगी जताई. सुनवाई के दौरान जजों ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि, "वोट बैंक के लिए किए जाने वाले राजनीतिक दिखावे और 'चमचागिरी' के आगे मंदिरों की सदियों पुरानी परंपराएं घुटने नहीं टेक सकतीं." लेकिन इसी के साथ कोर्ट ने मुख्यमंत्री जोसेफ विजय का उदाहरण पेश किया.

विजय से हिंदू धर्म अपनाने या धर्म परिवर्तन करने के लिए नहीं कहा गया

मद्रास हाई कोर्ट के जजों ने देश के सामने मिसाल देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री विजय से हिंदू धर्म अपनाने या धर्म परिवर्तन करने के लिए नहीं कहा गया था. वे ईसाई हैं और ईसाई ही रहे, लेकिन उन्होंने मंदिर की मर्यादा का सम्मान करते हुए केवल अपनी श्रद्धा की पुष्टि की. कोर्ट ने इसे ही असली 'समावेशी दृष्टिकोण' (Inclusive Approach) कहा, जो दिखाता है कि एक नेता अपनी व्यक्तिगत आस्था को बनाए रखते हुए भी बहुसंख्यक समाज की भावनाओं और परंपराओं का कितना गहरा सम्मान कर सकता है. चुनाव के समय चर्च में घुटने टेकने वाले विजय ने मीनाक्षी मंदिर में नियम मानकर यह साबित कर दिया कि वे किसी एक वर्ग के नहीं, बल्कि पूरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं.

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