क्या 'वोट चोरी' के मुद्दे से राहुल गांधी को मिलेगा कोई राजनीतिक फायदा? जानिए राजदीप की राय
राहुल गांधी के 'वोट चोरी' अभियान का चुनाव नतीजों पर भले ही तत्काल असर न दिखा हो, लेकिन इसने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और उसकी जवाबदेही को लेकर एक मजबूत राजनीतिक नैरेटिव खड़ा कर दिया है.
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार 'वोट चोरी' और चुनाव आयोग (ECI) के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं. इसे लेकर हाल ही में मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया गया और आज यानी 1 नवंबर को इंडिया गठबंधन की तरफ से रैली भी की जा रही है. इस पूरे घटनाक्रम पर देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने News Tak के साथ खास बातचीत में खुलकर अपनी राय रखी है. आइए जानते हैं कि इस पूरे विवाद, राहुल गांधी की मुहिम और चुनाव आयोग की कार्यशैली पर राजदीप सरदेसाई ने क्या बड़े खुलासे किए हैं.
क्या राहुल गांधी के अभियान से मिलेगा कोई राजनीतिक फायदा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी के इस 'वोट चोरी' अभियान से उन्हें या विपक्ष को कोई सीधा राजनीतिक फायदा मिलेगा? इस पर राजदीप सरदेसाई का कहना है कि इसका राजनीतिक लाभ मिलेगा या नहीं, यह आने वाले चुनाव नतीजे ही तय करेंगे. उन्होंने याद दिलाया कि करीब एक साल पहले जब राहुल गांधी ने बिहार में 'वोट चोरी' के खिलाफ अभियान चलाया था तब चुनाव परिणामों पर इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिला था. उस चुनाव में कैश ट्रांसफर और पैसों की ताकत का असर ज्यादा हावी रहा था, जहां नीतीश कुमार ने महिलाओं के खाते में पैसे भेजकर सियासी फायदा उठाया था.
राजदीप के मुताबिक, चुनाव जीतने के लिए केवल एक मुद्दा काफी नहीं होता. इसके लिए ज़मीन पर मजबूत संगठन, सत्ता में किए गए काम और स्थानीय कारक (Local Factors) बहुत मायने रखते हैं. इसलिए, सीधे तौर पर राजनीतिक फायदा अभी तक ज़मीन पर दिखाई नहीं दिया है.
फायदा नहीं, तो क्या सिर्फ 'नैरेटिव' बनाने की कोशिश है?
भले ही इसका सीधा चुनावी फायदा अभी नजर न आया हो, लेकिन राजदीप सरदेसाई मानते हैं कि इस मुहिम ने देश में एक बहुत बड़ा राजनीतिक नैरेटिव और माहौल जरूर खड़ा कर दिया है. उन्होंने कहा कि आज हम और आप यानी मीडिया, तमाम टीवी चैनल और जनता लगातार चुनाव आयोग के कामकाज पर खुलकर चर्चा कर रहे हैं. चुनाव आयोग के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि उसके डिसीजन-मेकिंग प्रोसेस (निर्णय लेने की प्रक्रिया) पर पिछले कुछ महीनों में इतनी बड़ी स्तर पर बातचीत हुई हो. किसी भी लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठना और उनकी निगरानी होना बहुत जरूरी है, और यह इस मुहिम की एक बड़ी उपलब्धि है.
चुनाव आयोग के फैसलों में दिखने लगा है बदलाव
राजदीप सरदेसाई ने इस बात पर जोर दिया कि पिछले कुछ हफ्तों में जिस तरह से लगातार सवाल उठाए गए हैं, उसका असर चुनाव आयोग के कई फैसलों पर भी दिखने लगा है. आयोग धीरे-धीरे अपने कई पुराने फैसलों से पीछे हट रहा है या उनमें सुधार कर रहा है:
- व्यक्तिगत सुनवाई से राहत: पहले नियम था कि अगर किसी के नाम वोटर लिस्ट से डिलीट हो गए हैं, तो उसे दफ्तर के चक्कर काटने होंगे और पर्सनल हियरिंग के लिए आना होगा. लेकिन अब यह व्यवस्था बदली जा रही है और बीएलओ (BLO) खुद घर-घर जाकर फॉर्म ले रहे हैं.
- फॉर्म-7 पर लगाम: पहले 'फॉर्म-7' के जरिए अंधाधुंध नाम काटे जा रहे थे, जहाँ एक ही व्यक्ति सैकड़ों लोगों के नाम डिलीट करने में लगा हुआ था. अब इस पर एक निश्चित सीमा तय कर दी गई है.
- सॉफ्टवेयर का रिव्यू: चुनाव आयोग के सेंट्रलाइज्ड सॉफ्टवेयर 'ECI Net' की पारदर्शिता पर उठ रहे सवालों के बीच अब आईआईटी (IIT) के जरिए इसका रिव्यू कराया जा रहा है.
- सुप्रीम कोर्ट के तीखे तेवर: अब सुप्रीम कोर्ट भी इन मामलों में संज्ञान ले रहा है और लगातार तीखी टिप्पणियां कर रहा है, जिससे संस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव और बढ़ गया है.
लोकतंत्र के लिए एक अच्छा और जरूरी कदम
बातचीत के अंत में राजदीप सरदेसाई ने यह साफ कहा कि चुनाव आयोग कोई भगवान नहीं है, और ऐसा सोचना गलत है कि उस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. कोई भी संस्था संविधान से ऊपर नहीं हो सकती.
उन्होंने यह भी उठाया कि साल 2023 में एक ऐसा कानून पारित किया गया था जिसके तहत चुनाव आयोग के अधिकारियों को क्रिमिनली प्रोसिक्यूट (आपराधिक रूप से अभियोजित) नहीं किया जा सकता. राजदीप के मुताबिक, इस कानून को बदला जाना चाहिए क्योंकि अगर कोई संस्था गलत या दुर्भावनापूर्ण फैसले लेती है, तो उस पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.
कुल मिलाकर, इस पूरे विवाद का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अब देश में चुनाव आयोग की कार्यशैली पर राजनेताओं, सिविल सोसाइटी और आम नागरिकों की पैनी नजर है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है.
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