संत को समर्थन देकर BJP के दिग्गज प्रह्लाद जोशी का विजय रथ रोक देंगे डीके शिवकुमार? ये है प्लान

रूपक प्रियदर्शी

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कर्नाटक में लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हर प्लानिंग पर डीके शिव कुमार भारी पड़ रहे हैं . डीके ने अपनी प्लानिंग से बीजेपी की नींद उड़ा रखी है. डीके की प्लानिंग से ही सालभर पहले बीजेपी ने दक्षिण में अपना किला गंवाया था. अब लोकसभा चुनाव में भी डीके ने कुछ ऐसा जाल बुना है कि बीजेपी तंग है. डीके के जाल में फंस गए हैं मोदी सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्री प्रह्लाद जोशी. 

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी धारवाड़ से चुनाव जीतने की हैट्रिक लगा चुके हैं. इस बार चौथी जीत की कोशिश है. प्रह्लाद जोशी का रास्ता रोकने के लिए चुनावी मैदान में आ गए हैं कर्नाटक के बड़े लिंगायत संत दिंगलेश्वर. गडग जिले में लिंगायतों के शिरहट्टी फक्किरेश्वर मठ के प्रमुख संत दिंगलेश्वर स्वामी ने निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान किया है. मकसद सिर्फ प्रह्लाद जोशी को हराना है. 

निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन करेगी कांग्रेस!

धारवाड़ से कांग्रेस विनोद आसुति को टिकट दे चुकी है. यूथ कांग्रेस के विनोद आसुति पहला लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं, लेकिन लगता है उनको टिकट लौटाना पड़ेगा. धारवाड़ में बीजेपी को हराने के लिए डीके शिव कुमार ने संत दिंगलेश्वर की निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन का संकेत दिया है. स्ट्रैटजी ये है कि कांग्रेस अपना उम्मीदवार हटा लेगी और संत दिंगलेश्वर को चुनाव जीतने में मदद करेगी. डीके कह रहे हैं कि कांग्रेस उम्मीदवार विनोद आसुति भी मजबूत है लेकिन कुछ भी चोरी-छिपे नहीं होगा. हम चाहेंगे तो सीधे समर्थन देंगे.

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धारवाड़ से हैट्रीक लगा चुके हैं प्रह्लाद जोशी

2009 में परिसीमन के बाद धारवाड़ लोकसभा सीट बनी थी और पहली बार अपना सांसद चुना. लिंगायत बहुल्य आबादी के बाद भी बीजेपी के ब्राह्मण उम्मीदवार प्रह्लाद जोशी चुनाव जीते. 2009 से अब तक तीन चुनाव हुए और तीनों बार जोशी एक लाख से ज्यादा वोटों से जीते. जोशी को बीजेपी ने चौथी बार टिकट दिया है लेकिन चौथी बार चुनाव जीतना मुश्किल हो रहा है. 

ये हवा बनाई जा रही है कि बीजेपी ने लिंगायत समाज की उपेक्षा की. 2019 में 9 लिंगायत सांसद बने लेकिन मोदी सरकार में किसी को मंत्री नहीं बनाया गया. धारवाड़ के लिंगायत संत समाज ने प्रह्लाद जोशी को टिकट देने से मना किया था. 27 मार्च को सम्मेलन करके बीजेपी को अल्टीमेटम दिया था कि जोशी को नहीं लड़ाया जाए लेकिन येदियुरप्पा ने विरोध की परवाह नहीं की. जब बीजेपी ने मांग अनसुनी की तो संत दिंगलेश्वर खुद मैदान में उतर गए. प्रह्लाद जोशी टेंशन में हैं लेकिन अपने खिलाफ चुनाव लड़ने वाले संत के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते.

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16-17 प्रतिशत आबादी के कारण कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत प्रभावशाली फैक्टर है. 224 विधानसभा सीटों में से करीब 100 सीटों पर लिंगायत हार-जीत तय कर सकते हैं. वोकालिगा आबादी 15 प्रतिशत, ओबीसी 35 प्रतिशत, अनुसूचित जाति-जनजाति के 18 प्रतिशत, मुस्लिमों के 13 प्रतिशत और ब्राह्मणों के 3 प्रतिशत मानी जाती है. 

बीजेपी छोड़ फिर कांग्रेस का समर्थन करेगा लिंगायत समाज?

करीब 30 साल पहले तक लिंगायत कांग्रेस के मजबूती के साथ खड़े होते थे लेकिन लेकिन येदियुरप्पा ने जैसे-जैसे बीजेपी का विस्तार किया, लिंगायत कांग्रेस से छिटकने लगे. येदियुरप्पा आज भी लिंगायतों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं. इसके कारण बीजेपी को लिंगायतों के वोट मिलते रहे हैं. कांग्रेस में टॉप के नेता वोक्कालिग्गा समुदाय के हैं. डीके शिव कुमार और सिद्धारमैया भी वोक्कालिगा समुदाय से हैं. जेडीएस में देवगौड़ा का परिवार भी वोक्कालिगा समुदाय का है. इससे लिंगायतों का समर्थन हासिल करने में येदियुरप्पा को हमेशा फायदा मिलता रहा. 

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हालांकि विधानसभा चुनाव से जातीय समीकरण बदलने लगे हैं. कांग्रेस ने 42 लिंगायतों को टिकट दिया जिसमें से 37 जीतकर विधायक बन गए. बीजेपी ने 69 लिंगायतों को टिकट दिया लेकिन सिर्फ 15 विधायक चुनाव जीत पाए. संत दिंगलेश्वर का समर्थन कांग्रेस के लिए लिंगायत का विश्वास जीतने का एक और मौका है.

 

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