Shesh Bharat: ओडिशा में बड़ा सियासी उलटफेर, बीजेडी-कांग्रेस साथ, बीजेपी के सामने नई चुनौती

ओडिशा में राज्यसभा की चौथी सीट को लेकर बीजेडी और कांग्रेस ने अप्रत्याशित गठजोड़ कर बीजेपी को कड़ी चुनौती दी है. 16 मार्च का यह मुकाबला सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है.

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ओडिशा की राजनीति में एक ऐसा मोड़ आया है जिसकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी मुश्किल थी. जो दल दशकों तक एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में आमने-सामने रहे, वे अब एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं. 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव ने राज्य की सियासत को नया रंग दे दिया है.

इस बार मुकाबला सिर्फ एक सीट का नहीं बल्कि भविष्य की दिशा का माना जा रहा है. राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव होना है. आंकड़ों के हिसाब से भारतीय जनता पार्टी के पास 82 विधायक हैं, जिससे उसकी दो सीटें लगभग तय मानी जा रही हैं. वहीं बीजू जनता दल के पास 48 विधायक हैं जिससे उसकी एक सीट सुरक्षित मानी जा रही है. असली संघर्ष चौथी सीट पर है, जहां जीत के लिए 30 वोट जरूरी हैं. बीजेडी के पास अपनी एक सीट जीतने के बाद 18 वोट बचते हैं, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सहयोगियों के पास 15 वोट हैं. यानी कुल 33 वोट जो जीत के लिए पर्याप्त से ज्यादा हैं.

चौथी सीट के लिए बीजेडी और कांग्रेस ने मिलकर एक साझा उम्मीदवार उतारा है डॉ. दत्तेश्वर होता. वे एक सम्मानित यूरोलॉजिस्ट हैं और ओडिशा यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के पूर्व कुलपति रह चुके हैं. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को राज्य में खास माना जाता है. उनकी साफ छवि और गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण दोनों दल इस नाम पर सहमत हुए. 

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भक्त चरण दास की बड़ी भूमिका

इस गठजोड़ के पीछे बड़ी भूमिका कांग्रेस नेता भक्त चरण दास की मानी जा रही है. उन्होंने कांग्रेस विधायकों को एकजुट रखने के साथ-साथ अन्य सहयोगियों को भी साथ लाने में अहम भूमिका निभाई. राजनीतिक गलियारों में इसे बीजेपी को रोकने की रणनीतिक चाल माना जा रहा है. 

हालांकि सियासी गणित जितना सीधा दिख रहा है उतना है नहीं. बीजेपी के पास तीसरी सीट के लिए जरूरी संख्या से कुछ वोट कम हैं लेकिन अगर वह तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला रोचक हो सकता है. बीजेडी के दो विधायक निलंबित हैं और संभावित क्रॉस वोटिंग को लेकर भी अटकलें हैं. ऐसे में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ की चर्चाएं भी तेज हैं. 

इस पूरे घटनाक्रम को 2029 के विधानसभा चुनावों की झलक के तौर पर भी देखा जा रहा है. कभी कांग्रेस विरोध की बुनियाद पर खड़ी हुई बीजेडी आज उसी कांग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है. 1997 में बीजू पटनायक के निधन के बाद नवीन पटनायक ने पार्टी बनाई थी और लंबे समय तक कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंद्वी बताया. 1998 से 2009 तक बीजेडी-बीजेपी गठबंधन ने साथ शासन किया, लेकिन 2009 के कंधमाल दंगों के बाद रास्ते अलग हो गए.

2024 के चुनाव में बदल गए हालात

2024 के चुनावों के बाद हालात पूरी तरह बदल गए. बीजेडी अब खुद को आक्रामक विपक्ष के रूप में पेश कर रही है. नवीन पटनायक ने साफ कहा कि अब केंद्र सरकार को समर्थन नहीं, बल्कि विरोध किया जाएगा. राज्य की विधानसभा में वे पहली बार विपक्ष के नेता की भूमिका में हैं और सीएम मोहन चरण मांझी की सरकार पर लगातार हमलावर हैं.

अब नजरें 16 मार्च पर टिकी हैं. क्या यह गठबंधन सिर्फ एक सीट तक सीमित रहेगा या ओडिशा की राजनीति में नए समीकरणों की नींव रखेगा? जवाब जल्द सामने होगा, लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव राज्य की सियासत में बड़ा बदलाव दर्ज कर सकता है.

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