राहुल गांधी बोले- आरक्षण पर 50% की लिमिट खत्म करेंगे, जानिए क्या रिजर्वेशन बढ़ाना मुमकिन है?

अभिषेक गुप्ता

ADVERTISEMENT

newstak
social share
google news

Rahul Gandhi on Reservation: कांग्रेस नेता राहुल गांधी देश में पूर्व से लेकर पश्चिम तक भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले हुए हैं. राहुल की यात्रा मणिपुर से चली थी जो इस समय झारखंड में है. झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन के इस्तीफे के बाद वहां चंपई सोरेन के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ है. मंगलवार को राहुल गांधी प्रदेश में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे जहां उन्होंने हेमंत सोरेन की ED द्वारा गिरफ्तारी पर रोष व्यक्त करते हुए बीजेपी और केन्द्रीय एजेंसियों को निशाना बनाया. इसी बीच राहुल गांधी ने देश में आरक्षण को लेकर एक बड़ी बात कह दी. उन्होंने कहा कि जब उनकी सरकार केंद्र में आएगी तब देश में जातिगत जनगणना कराएगी. उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया कि आरक्षण की सीमा पर लगी 50 फीसदी की अपर लिमिट को भी हटा दिया जाएगा. राहुल गांधी के इस बयान के बाद सवाल यह है कि क्या असल में ऐसा संभव है? आइए हम आपको बताते हैं कि देश में क्या है आरक्षण को लेकर नियम और मौजूदा समय में आरक्षण का क्या है स्ट्रक्चर.

पहले जानिए देश में आरक्षण का इतिहास

देश में आरक्षण को लेकर लंबे समय से कवायद जारी है. सबसे पहले साल 1953 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति को समझने के लिए कालेलकर आयोग बनाया गया. आयोग की रिपोर्ट में अनुसूचित जाति(SC), अनुसूचित जनजाति(ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग(OBC) के लिए सुझाव दिए गए. सरकार ने SC और ST के लिए दी गईं सिफारिशों को तो मान लिया पर OBC के लिए नहीं माना. फिर साल 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने पिछड़े वर्गों की समाज में स्थिति के मूल्यांकन के लिए वी.पी. मंडल की अध्यक्षता में मंडल कमीशन बनाया. 1991 में वी पी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए OBC के लिए आरक्षण का प्रावधान किया.

इसके बाद से ही आरक्षण को लेकर देश में बहस जारी है कि, आरक्षण किसे कितना मिलना चाहिए, होना भी चाहिए या नहीं?

ADVERTISEMENT

यह भी पढ़ें...

क्या है देश में आरक्षण का स्ट्रक्चर?

देश में साल 2019 तक ST को 7.5 फीसदी, SC को 15 फीसदी और OBC को 27 फीसदी यानी कुल 49.5 फीसदी के आरक्षण का प्रावधान था. फिर समाज के विभिन्न वर्गों को मिले आरक्षण के साथ ही केंद्र सरकार ने 2019 में एक विधेयक लाकर सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े (EWS) लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया. यानी अब देश में कुल 60 फीसदी का आरक्षण लागू है. वैसे केंद्र सरकार 10 फीसदी के EWS आरक्षण पर ये दलील देती है कि, यह आरक्षण की सीमा का उलंघन नहीं है क्योंकि इसके लिए अलग से पद निकाले जाएंगे या सीटें बढ़ाई जाएंगी. कुल मिलाकर इसके लिए 100 फीसदी में पहले के मिले 49.5 फीसदी के आरक्षण को प्रभावित नहीं किया जाएगा.

आरक्षण को लेकर कोई नियम भी है या नहीं?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक पदों पर अवसर की समानता की बात की गई है. हमारे देश में आरक्षण की पूरी थ्योरी संविधान के इसी अनुच्छेद पर आधारित है, जिसके विभिन्न भागों में आरक्षण को लेकर कई बातें कही गईं है. वी पी सिंह की सरकार के OBC के लिए आरक्षण को लागू करने की व्यवस्था करने के बाद से देश में आरक्षण को लेकर जमकर बवाल हुआ. इसे लेकर सर्वोच्च अदालत में भी मामला उठा, तब साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट(SC) ने इंदिरा साहनी वाद में आरक्षण की सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया. SC ने अपने फैसले में देश में जातिगत आरक्षण की सीमा को अधिकतम 50 फीसदी तक तय कर दिया.

ADVERTISEMENT

इसके बाद से ही SC का यह फैसला पत्थर की लकीर बन गया और आरक्षण 50 फीसदी पर सीमित हो गया. देश में जहां भी आरक्षण की सीमा 50 फीसदी को पार करती है, SC ने उसे निरस्त कर दिया. केंद्र सरकार ने 2019 में EWS को 10 फीसदी आरक्षण संविधान में संशोधन करके दिया. 50 फीसदी की सीमा से ऊपर जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने भी 2022 में इसे वैधता दे दी.

राहुल के 50 फीसदी आरक्षण के बैरिकेट को क्रॉस करने की क्या है असलियत?

1992 में सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी वाद में दिए गए फैसले के मुताबिक, आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तक हो सकती है. हालांकि इसके बाद भी संविधान में संसोधन करके इस सीमा में परिवर्तन किया गया है, EWS को मिला 10 फीसदी का आरक्षण इसका उदाहरण है. हालांकि इसकी प्रक्रिया जटिल और विवादास्पद है क्योंकि संविधान में संसोधन कर अगर इसे अमल में ला भी दें फिर भी सुप्रीम कोर्ट उसका रिव्यू कर उसे निरस्त कर सकता है. तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में आरक्षण बढ़ाने के लिए गए प्रयासों में हमने देखा कि, कैसे SC ने उन कानूनों को संविधान के मूलभूत स्ट्रक्चर का उलंघन बता निरस्त कर दिया.

ADVERTISEMENT

वैसे पिछले दिनों बिहार में भी आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 75 फीसदी कर दिया गया है. बिहार में जातिगत सर्वे का हवाला देकर ऐसा किया गया है. ऐसा नहीं है कि आरक्षण की सीमा को बढ़ाया नहीं जा सकता. अभी की व्यवस्था के मुताबिक आरक्षण की सीमा अगर बढ़ाई जाती है, तो उसे न्यायसम्मत होना चाहिए जिसपर संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों अपनी मुहर लगाएगा.

    follow on google news
    follow on whatsapp

    ADVERTISEMENT