राज्यसभा चुनाव: शाखा से संसद तक, 9 हार के बाद पहली बार जीतने जा रहे राहुल सिन्हा की अनसुनी कहानियां
पश्चिम बंगाल राज्यसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने पुराने दिग्गज राहुल सिन्हा को मैदान में उतारकर सबको चौंका दिया है. जानिए कौन हैं 'बीजेपी के हनुमान' कहे जाने वाले राहुल सिन्हा और कैसे उनके नामांकन ने बंगाल की सियासत में हलचल पैदा कर दी है. पढ़ें सीटों का पूरा गणित.

बंगाल में विधानसभा चुनाव के चढ़ते पारे के बीच जो अचानक चर्चा में आ गया वो नाम है राहुल सिन्हा का. बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी पहली लिस्ट जारी कर सबको चौंका दिया है. लिस्ट में पश्चिम बंगाल बीजेपी के बड़े और पुराने नेता राहुल सिन्हा का नाम शामिल है. आखिर कौन हैं राहुल सिन्हा? क्यों उन्हें 'बीजेपी का हनुमान' कहा जाता है? राहुल सिन्हा को बीजेपी ने राज्यसभा भेजकर बंगाल की राजनीति में 'भूकंप' ला दिया है.
देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान होना है. नामांकन की आखिरी तारीख 5 मार्च है. पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं. इस बार 5 राज्यसभा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. TMC आसानी से 4 सीटें जीतने की स्थिति में है. 65 विधायक होने के साथ BJP पहली बार अपने दम पर 1 सीट जीतने जा रही है. एक सीट जीतने के लिए 50 वोटों की जरूरत है जो बीजेपी के पास है राहुल सिन्हा को जिताने के लिए. गणित के अनुसार, चुनाव में किसी बड़े उलटफेर की गुंजाइश कम है. तृणमूल कांग्रेस के चार उम्मीदवार पूर्व डीजीपी राजीव कुमार, मेनका गुरुस्वामी, बाबुल सुप्रियो और कोयल मलिक के भी जीतने के पूरे चांस हैं.
राहुल सिन्हा का राजनीतिक सफर संघर्ष की एक ऐसी मिसाल है जिसके बारे में सुनकर दंग रह जाएंगे. ये उस दौर के नेता हैं जब बंगाल की गलियों में बीजेपी का नाम लेना भी खतरे से खाली नहीं था. जब दरी बिछाने के लिए जमीन भी नहीं थी तब राहुल सिन्हा ने बीजेपी का रास्ता पकड़ा. तब से 40 सालों की राजनीति में कभी पार्टी नहीं बदली.
राहुल सिन्हा का राजनैतिक सफर
राहुल सिन्हा का जन्म और पालन-पोषण बंगाल में हुआ. बचपन से ही उनका झुकाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की ओर था. उन्होंने एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में काम शुरू किया, जहां से उन्होंने अनुशासन और संगठन के गुण सीखे. 80 के दशक में बंगाल में लेफ्ट का शासन चरम पर था, तब राहुल सिन्हा ने बीजेपी के युवा मोर्चे में कदम रखा. उस समय बंगाल में बीजेपी के पास न वोट था, न ही दफ्तर. उस समय बीजेपी का झंडा उठाया जब बंगाल में उसे कोई पूछता नहीं था.
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आज जब बीजेपी बंगाल की प्रमुख ताकत है, तो राहुल सिन्हा को राज्यसभा भेजना पार्टी का एक 'थैंक यू' नोट माना जा रहा है. पिछले कुछ सालों में टीएमसी से आए नेताओं को ज्यादा तवज्जो मिलने से पुराने कार्यकर्ता नाराज थे. राहुल सिन्हा को राज्यसभा भेजकर बीजेपी ने संदेश दिया है कि 'असली कैडर' का अपमान नहीं होगा.
दशकों तक जमीनी कार्यकर्ता रहे राहुल सिन्हा
राहुल सिन्हा ने पार्टी में किसी बड़े पद की लालसा के बिना दशकों तक एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में काम किया. बरसों की लगन और संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें 2009 में पहली बार पश्चिम बंगाल बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. फिर 2015 तक लगातार दो बार अध्यक्ष रहे. ये वही दौर था जब बंगाल में सत्ता परिवर्तन की लहर चल रही थी. उनके समय में ही बीजेपी ने बंगाल में 'शून्य' से 'मुख्य विपक्षी' बनने का सफर शुरू किया था. राहुल सिन्हा ने बंगाल में उस 'हिंदुत्व' की जमीन तैयार की जिस पर आज पार्टी चुनाव लड़ती है. मेहनत का एक और बड़ा इनाम मिला जब बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया. इससे राहुल सिन्हा नेशनल इमेज बनाने में सफल हुए.
40 साल का करियर, 9 बार चुनाव लड़े पर जीते नहीं
राहुल सिन्हा ने अपने 40 साल के राजनीतिक करियर में अब तक कुल 9 बार विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़े हैं, लेकिन हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इतने चुनाव तब लड़े जब बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना हार की गारंटी माना जाता था. 2014 में कोलकाता नॉर्थ से राहुल सिन्हा खुद अपना चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी ने बंगाल में पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में 2 लोकसभा सीटें जीतीं.
बंगाल में राहुल सिन्हा बंगाली संस्कृति और हिंदी भाषी वोटर्स के बीच एक 'ब्रिज' की तरह काम करते हैं. सिन्हा की छवि एक साफ-सुथरे और बौद्धिक नेता की है, जो बंगाल के भद्रलोक और शहरी मध्यम वर्ग को आकर्षित करती है. कोलकाता, हावड़ा और आसनसोल जैसे इलाकों में हिंदी भाषी आबादी का दबदबा है. राहुल सिन्हा उन इलाकों में बीजेपी के सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक हैं.
ममता बनर्जी और राहुल सिन्हा- ये वो दो नाम हैं जो एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते. राहुल सिन्हा ने हमेशा ममता पर 'तुष्टिकरण की राजनीति' का आरोप लगाया. उन्होंने खुलेआम कहा कि 'दीदी' घुसपैठियों की संरक्षक हैं. यही वो नेता हैं जिन्होंने ममता के हिजाब पहनने से लेकर उनकी प्रशासनिक फाइलों तक पर सवाल उठाए. ममता बनर्जी के लिए राहुल सिन्हा एक चुभता हुआ कांटा रहे हैं.
राहुल सिन्हा को राज्यसभा भेजने के पीछे पार्टी की रणनीति क्या है?
राहुल सिन्हा का राज्यसभा जाना बंगाल की राजनीति में एक बड़ा संदेश है. क्या यह बंगाल में पुराने कार्यकर्ताओं के बढ़ते गुस्से को शांत करने की कोशिश है? या 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले की कोई बड़ी रणनीति? वजह जो भी हो, लेकिन राहुल सिन्हा का संसद के ऊपरी सदन में पहुंचना उनके 4 दशक के संघर्ष की जीत है. उनकी इस 'सरप्राइज एंट्री' को उनकी 40 साल की वफादारी और तपस्या का इनाम माना जा रहा है.
राजनीतिक गलियारों में एक सवाल गूंज रहा है- आखिर राहुल सिन्हा ही क्यों? जब अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब उन्होंने ही 2015 में राहुल सिन्हा को राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया था. राहुल सिन्हा ने शाह के हर 'बंगाल मिशन' को जमीन पर उतारा. जब सिन्हा को 2020 में राष्ट्रीय टीम से बाहर किया गया था, तब भी उन्होंने बगावत करने के बजाय कहा था कि 'पार्टी के अनुशासित सिपाही' हैं और रहेंगे.
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