सुशील कुमार शिंदे ने राजनीति से लिया संन्यास, पुलिस सब इंस्पेक्टर से गृहमंत्री तक का सफर

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महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया है.
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया है.
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न्यूज तकः महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया है. शिंदे ने कहा है कि 2024 का चुनाव उनकी बेटी प्रणिति लडेंगी. शिंदे 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए थे. तब सोलापुर से शिंदे के सामने प्रकाश अंबेडकर (बाबासाहेब अंबेडकर के पोते) और बीजेपी से डॉ.जयसिद्धेश्वर शिवाचार्य मैदान में थे. यह तब हुआ था जबकि सुशील कुमार शिंदे ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि यह उनका आखिरी चुनाव है.

महाराष्ट्र के एक छोटे से जिले से निकलकर देश के गृहमंत्री बनने तक का सुशील कुमार शिंदे का सियासी सफर काफी लंबा रहा है. सोलापुर जिले के एक दलित परिवार में जन्मे सुशील कुमार शिंदे का जन्म 4 सितंबर 1941 को हुआ था. शिंदे ने हॉस्पिटल में वॉर्ड बॉय की नौकरी भी की. वह पुलिस की नौकरी में भी आए और फिर राज्य के मुख्यमंत्री और बाद में भारत के गृहमंत्री बने.

कैसे हुई राजनीति में एंट्री

सुशील कुमार शिंदे के पिता जूते की मरम्मत करते थे. पढ़ने-लिखने की उम्र में ही उन्हें एक हॉस्पिटल में वॉर्ड बॉय के तौर पर काम करना पड़ा. बाद में कानून की डिग्री लेकर 1965 में सोलापुर की ही एक अदालत में उन्होंने वकालत शुरू की. मन नहीं लगा तो पुलिस भर्ती की परीक्षा दी और सब-इंस्पेक्टर हो गए. पांच साल तक नौकरी की. इस दौरान वह शरद पवार (फिलहाल एनसीपी चीफ, तब कांग्रेस में थे) के संपर्क में आए. पवार के कहने पर शिंदे पुलिस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आ गए.

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राज्य के मुख्यमंत्री से देश के गृहमंत्री तक

शिंदे ने राजनीति में एंट्री 1971 में की. साल 1974 में उन्हें करमाला से टिकट मिला. करमाला से इसलिए क्योंकि शिंदे खुद सोलापुर जिले की इसी सीट से आते हैं. इसके बाद लगातार उन्होंने चार विधानसभा चुनाव 1978, 1980, 1985 और 1990 जीते. साल 1992 में राज्यसभा के लिए भी चुने गए. साल 1999 में सोनिया गांधी के लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए सुशील शिंदे को भेजा गया. शिंदे ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. माना जाता है कि उस चुनाव के बाद ही शिंदे सोनिया गांधी के करीब आए.

शिंदे को देशव्यापी पहचान तब मिली जब उन्होंने उप-राष्ट्रपति पद के लिए भैरोंसिंह शेखावत के खिलाफ चुनाव लड़ा. शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके थे और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बड़े नेता माने जाते थे. शिंदे ये चुनाव हार गए. महाराष्ट्र की 10वीं विधानसभा में विलासराव देशमुख के हटने के बाद शिंदे 1 साल 288 दिनों के लिए महाराष्ट्र के पहले दलित मुख्यमंत्री बने. 18 जनवरी, 2003 से लेकर 1 नंवबर 2004 तक उन्होंने सीएम के तौर पर कार्य किया.

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बाद में विलासराव देशमुख के साथ आंतरिक कलह की बातें सामने आईं. तब शिंदे को सक्रिय राजनीति से दूर आंध्रप्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया. 2006 में शिंदे एक बार फिर राज्यसभा के लिए चुने गए. मनमोहन सरकार में ऊर्जा मंत्री रहने के बाद 2012 में शिंदे भारत के गृहमंत्री बने. 2019 में जब लोकसभा चुनाव हारने के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दिया था, तब सुशील कुमार शिंदे को कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाए जाने की भी चर्ची जोरों पर थी.

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राजनीतिक विरासत

सुशील शिंदे की तीन बेटियां हैं. इनमें प्रणिता शिंदे सोलापुर से ही विधायक हैं. सुशील कुमार शिंदे ने अपनी राजनीतिक विरासत प्रणिता को ही सौंपी है. प्रणिता भी सोलापुर सीट से तीन बार की विधायक रह चुकी हैं. रिटायरमेंट के समय मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि अब उनकी जगह उनकी बेटी चुनाव लड़ेंगी

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