क्या पंजाब में फिर से हाथ मिलाएंगे अकाली दल और बीजेपी? अमित शाह के बयान ने बढ़ाई सरगर्मी!
पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए की सरकार बनने के अमित शाह के दावे और सुखबीर सिंह बादल के समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन के संकेत देने से राज्य की राजनीति में सुगबुगाहट तेज हो गई है.
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पंजाब की सियासत में इन दिनों कुछ बड़ा पक रहा है. राज्य में अगले साल (2027) होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. एक तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे ने हलचल बढ़ा दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि इस बार पंजाब में एनडीए की सरकार बनने जा रही है. वहीं दूसरी तरफ, शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के ताज़ा बयान ने इन अटकलों को और हवा दे दी है कि क्या एक बार फिर अकाली दल और बीजेपी का पुराना गठबंधन लौट सकता है?
सरकार आए या ना आए
राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात के बाद मीडिया से मुखातिब हुए सुखबीर सिंह बादल ने गठबंधन के सवाल पर खुलकर बात की. उन्होंने साफ कहा कि अकाली दल के लिए 'पंजाब नंबर वन' है.
सुखबीर बादल ने बेबाकी से कहा, "सरकार आए या ना आए, हम पंजाबियों के हक के लिए लड़ते रहेंगे." उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) को पंजाब का सबसे बड़ा दुश्मन करार देते हुए कहा कि इन दोनों दलों के साथ किसी भी तरह के समझौते का सवाल ही पैदा नहीं होता. हालांकि, जब बात समान विचारधारा वाले दलों के साथ आने की आई तो उन्होंने कहा कि जो पार्टियां अकाली दल के एजेंडे और विचारों से सहमत हैं, उनके साथ गठबंधन के लिए दरवाजे पूरी तरह खुले हैं.
सीटों का पेंच और तल्ख तेवर
भले ही दोनों दलों के बीच नजदीकियों की चर्चाएं जोरों पर हों, लेकिन राह इतनी आसान भी नहीं दिखती. सबसे बड़ा पेंच सीटों के बंटवारे को लेकर फंसा हुआ है.
- पुराना फॉर्मूला हुआ पुराना: पहले जब अकाली दल और बीजेपी साथ थे, तो बीजेपी आमतौर पर पंजाब में 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी. लेकिन इस बार भगवा पार्टी का मूड बदला हुआ है. बीजेपी इस बार 50 से 55 सीटों पर ताल ठोकने की तैयारी कर रही है और वह छोटे भाई की भूमिका निभाने के बिल्कुल मूड में नहीं है.
- हरदीप पुरी का कड़ा रुख: पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी साफ कर दिया था कि अगर भविष्य में दोनों दल साथ आते भी हैं, तो पुराना 22 सीटों वाला फॉर्मूला अब नहीं चलेगा और शर्तें बराबरी की होंगी.
वैसे, इन चर्चाओं को तब और बल मिला जब इस साल अगस्त में सुखबीर बादल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. हालांकि, इसके ठीक उलट पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों सहित कई स्थानीय नेता यह दावा करते रहे हैं कि पार्टी आगामी चुनाव अपने दम पर लड़ेगी.
कभी अटूट था बंधन, फिर कृषि कानूनों ने डाली दरार
बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन भारतीय राजनीति के सबसे पुराने गठबंधनों में शुमार रहा है. 1966 में पंजाब-हरियाणा के अलग होने के बाद से दोनों दलों ने कई उतार-चढ़ाव देखे. 1977, 2007 और 2012 के चुनावों में इस जोड़ी ने मिलकर इतिहास रचा और कई बार सरकार बनाई. केंद्र की एनडीए सरकार में भी अकाली दल लंबे समय तक अहम हिस्सेदार रहा.
लेकिन सितंबर 2020 का वह दौर सबको याद है जब केंद्र सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के चलते अकाली दल ने बीजेपी से अपना 24 साल पुराना रिश्ता तोड़ लिया था. इसके बाद 2022 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव दोनों ने अलग-अलग ही लड़ा था.
मौजूदा सरकार पर चौतरफा वार और अकाली दल की चुनौती
फिलहाल, भगवंत मान के नेतृत्व वाली 'आप' सरकार राज्य में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और बढ़ते नशे के मुद्दों को लेकर बुरी तरह घिरी हुई है. विधानसभा के भीतर भी कांग्रेस ने सरकार को जमकर घेरा और यहां तक आरोप लगाया कि राज्य पर कर्ज बढ़कर पांच लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.
नशा मुक्ति का मुद्दा इस समय पंजाब के हर दल के एजेंडे में है. चाहे वह 'आप' हो, कांग्रेस हो या फिर अकाली दल. लेकिन शिरोमणि अकाली दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता के बीच अपनी साख और विश्वसनीयता को फिर से बहाल करने की है, खासकर तब जब अतीत में उन पर नशे को लेकर गंभीर आरोप लगते रहे हैं.
आगे क्या होगा?
राजनीतिक गलियारों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या दोनों पुराने यार एक बार फिर हाथ मिलाते हैं और अगर मिलाते हैं, तो सीट शेयरिंग का यह सियासी गणित कैसे सुलझता है.
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