टैबलेट और स्मार्ट क्लास का वादा, लेकिन बच्चों को नसीब नहीं अच्छा खाना; राजस्थान का 'पोषण कांड' वायरल
Rajasthan Mid Day Meal controversy: राजस्थान के पाली जिले के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील योजना के तहत बच्चों को खराब भोजन परोसे जाने का मामला सामने आया है. NGO द्वारा सप्लाई किए जा रहे खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि राज्य सरकार स्मार्ट क्लास और टैबलेट जैसी योजनाओं की घोषणा कर रही है. यह 'पोषण कांड' अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.

राजस्थान सरकार एक ओर बजट 2026 में बच्चों को वर्ल्ड क्लास एजुकेशन और टैबलेट देने के वादे कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में बच्चों के निवाले पर संकट मंडरा रहा है. पाली जिले के सरकारी स्कूलों से आई तस्वीरें 'मिड-डे मील' योजना की पोल खोल रही हैं. यहां बच्चों को पौष्टिक आहार के नाम पर जो परोसा जा रहा है, उसे देखकर किसी का भी दिल दहल जाए.
दाल में पानी या पानी में दाल?
पाली के स्कूलों में मिड-डे मील की स्थिति बेहद दयनीय है. बच्चों की थाली में रोटियां या तो जली हुई हैं या आधी कच्ची. दाल की स्थिति ऐसी है कि उसमें दाल कम और पानी ज्यादा नजर आता है. हद तो तब हो गई जब मंगलवार के मेनू में दाल-चावल और सब्जी की जगह बच्चों को सिर्फ खिचड़ी थमा दी गई. शिक्षकों का कहना है कि खाना इतना खराब होता है कि कई बार बच्चों को भूख मिटाने के लिए बिस्किट और नमकीन के पैकेट देने पड़ते हैं.
NGO का 'पोषण कांड'
पाली शहर के कई स्कूलों में खाना स्कूल में बनने के बजाय बाहर के NGO और स्वयं सहायता समूहों द्वारा सप्लाई किया जा रहा है. जानकारी के अनुसार, तीन प्रमुख संस्थाएं चेतना स्वयं सहायता समूह, श्रीदेवी सेवा समिति और खेतेश्वर सेवा समिति शहर के करीब 55 स्कूलों में भोजन वितरण का जिम्मा संभाल रही हैं. लेकिन इन संस्थाओं द्वारा दिए जा रहे खाने की गुणवत्ता पर कोई लगाम नहीं है.
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सिस्टम की लापरवाही और शिक्षकों की लाचारी
जब स्कूल के प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने माना कि खाना अक्सर खराब आता है. एक शिक्षिका ने बताया, 'आज दाल बहुत पतली थी और रोटियां जली हुई थीं. हमने तुरंत NGO को फोन किया, तो जवाब मिला कि वर्कर ने खाना बनाया है, कल से ठीक आएगा.' सवाल यह है कि क्या हर दिन बच्चों के स्वास्थ्य के साथ इसी तरह समझौता किया जाएगा?
बजट और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर
राजस्थान की वित्त मंत्री दिया कुमारी ने बजट में स्कूलों को स्मार्ट बनाने और एआई (AI) आधारित लैब स्थापित करने का ऐलान किया है. लेकिन पाली की ये तस्वीरें पूछ रही हैं कि क्या स्मार्ट क्लासरूम उन बच्चों के काम आएंगे जिनकी थाली से पोषण गायब है? क्या टैबलेट बांटने से उन बच्चों का पेट भरेगा जिन्हें भरपेट पौष्टिक खाना तक नसीब नहीं हो रहा? फिलहाल, पाली प्रशासन की चुप्पी इस पूरे 'पोषण कांड' में उनकी भूमिका पर सवालिया निशान लगा रही है. क्या इन एनजीओ पर कार्रवाई होगी या गरीब बच्चों की थाली इसी तरह समझौतों की भेंट चढ़ती रहेगी?
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