ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी का ‘यूपी कनेक्शन’! बाराबंकी के इस गांव से जुड़ी हैं जड़ें
ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी के पूर्वजों का संबंध उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से था. उनके दादा किंतूर गांव में जन्मे थे. 1979 की इस्लामिक क्रांति के दौरान उन्हें विदेशी मूल का बताकर विवाद खड़ा किया गया.

ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है. ईरानी मीडिया 'प्रेस टीवी' ने पुष्टि की है कि उनके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों में मारे गए हैं. उनके साथ उनके परिवार के कई सदस्य भी मारे गए हैं. खामेनेई की मौत के बाद ईरान में एक हफ्ते के सार्वजनिक अवकाश और 40 दिन के सार्वजनिक शोक की घोषणा की गई है. वहीं सोशल मीडिया पर ये बात खूब वायरल है कि खामेनेई का इंडिया से कनेक्शन है, लेकिन ये सच नहीं है. आइए समझते हैं पूरी बात...
इतिहास के कई पन्ने पलटे तो पता चलता है कि ईरान में इस्लामिक क्रांति लाने वाले और वहां के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी का नाता भारत के उत्तर प्रदेश से था. खुमैनी के पूर्वज यूपी के बाराबंकी जिले के रहने वाले थे.
किसका था भारत से कनेक्शन
वर्तमान में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का भारत से कोई कनेक्शन नहीं हैं. असलियत यह है कि खामेनेई से पहले ईरान की कमान संभालने वाले रूहोल्लाह मुसावी खुमैनी का परिवार उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखता था. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि खुमैनी के दादा भारत के बाराबंकी जिले के निवासी थे और यहीं से उनका पुश्तैनी नाता था.
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बाराबंकी का किंतूर गांव और खुमैनी का परिवार
जानकारी के मुताबिक, खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी का जन्म बाराबंकी के एक छोटे से गांव 'किंतूर' में हुआ था. उस समय किंतूर शिया विद्वानों का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था. हैरान करने वाली बात यह है कि मुसावी अपने नाम के साथ 'हिंदी' शब्द भी जोड़ते थे, ताकि हिंदुस्तान के प्रति अपना प्यार जाहिर कर सकें. हालांकि, यह परिवार मूल रूप से ईरानी ही था, जो 18वीं सदी के आखिर में भारत आकर बस गया था.
भारत क्यों आए थे खुमैनी के पुरखे?
जानकारों का मानना है कि उस दौर में ईरान में सत्ता का संघर्ष चल रहा था. शांति और धर्म प्रचार की तलाश में कई ईरानी विद्वान लखनऊ, बाराबंकी और हैदराबाद जैसे इलाकों में आ बसे. बाराबंकी के नवाब विद्वानों का काफी सम्मान करते थे, इसलिए मुसावी का परिवार भी वहीं बस गया. बाद में मुसावी धार्मिक यात्रा के लिए इराक गए और वहां से फिर अपने मूल देश ईरान लौट गए.
विरोधियों ने खुमैनी को कहा था 'बाहरी'
जब खुमैनी ईरान में शाह रजा पहलवी की सरकार के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व कर रहे थे, तब उनके भारत कनेक्शन को हथियार बनाया गया. रजा सरकार ने उन्हें 'विदेशी मूल' का बताकर जेल में डाल दिया था ताकि उनकी लोकप्रियता कम की जा सके. हालांकि, खुमैनी ने जेल और निर्वासन से ही लेख लिखकर साफ किया कि उनके पूर्वज धर्म प्रचार के लिए भारत गए थे, लेकिन उनका खून और जड़ें पूरी तरह ईरानी हैं.
1979 की क्रांति और खामेनेई का दौर
बाद में जनता ने खुमैनी का साथ दिया और 1979 में ईरान में बड़ा तख्तापलट हुआ. खुमैनी वहां के सर्वोच्च नेता बने और अपनी मृत्यु तक सत्ता संभाली. खुमैनी के बाद सत्ता उनके शिष्य अयातुल्ला खामेनेई को मिली.
खामेनेई और खुमैनी का क्या कनेक्शन है?
ईरान के वर्तमान नेता अयातुल्ला खामेनेई और पूर्व नेता रूहोल्लाह खुमैनी एक ही परिवार के नहीं हैं. खुमैनी ईरान की इस्लामिक क्रांति के जनक थे, जिनके दादा का संबंध यूपी के बाराबंकी से था. वहीं, खामेनेई उनके सबसे भरोसेमंद शिष्य और उत्तराधिकारी रहे हैं. 1989 में खुमैनी के निधन के बाद खामेनेई को सर्वोच्च नेता चुना गया. इनके बीच खून का नहीं बल्कि गुरु-शिष्य का मजबूत राजनीतिक रिश्ता रहा है.










