बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट का चुनाव अब केवल एक विधान परिषद सदस्य चुनने की प्रक्रिया भर नहीं रह गया है. यह मुकाबला सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (JDU) के अंदरूनी वजूद, सांगठनिक साख और भविष्य के नेतृत्व का सबसे बड़ा इम्तिहान बन चुका है. एक तरफ मोकामा से विधायक अनंत सिंह (छोटे सरकार) जन सुराज समर्थित प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह की जीत सुनिश्चित करने के लिए अपने लाव-लश्कर के साथ चुनावी मैदान में डटे हुए हैं, तो दूसरी तरफ जेडीयू के आधिकारिक प्रत्याशी नीरज कुमार की जीत पक्की करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे और स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने खुद कमान संभाल ली है.
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ललन सिंह की मध्यस्थता बेअसर, अनंत सिंह की ज़िद बरकरार
इस अंदरूनी विवाद को खत्म करने के लिए पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को दोनों नेताओं के बीच समझौता कराने की जिम्मेदारी सौंपी थी. हालांकि, ललन सिंह की कोशिशें पूरी तरह बेअसर साबित हुईं और अनंत सिंह ने पार्टी लाइन को दरकिनार कर दिया. अनंत सिंह का स्पष्ट कहना है कि वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति पूरी तरह निष्ठावान हैं और जेडीयू में ही रहेंगे, लेकिन उनका सीधा विरोध नीरज कुमार से है. वे खुलेआम ऐलान कर रहे हैं कि वे नीरज कुमार का राजनीतिक हिसाब चुकता करने और जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह को जिताने के लिए ही मैदान में उतरे हैं. वे लगातार अपने समर्थकों के साथ रोड शो कर रहे हैं और 21 तारीख के मतदान के बाद नतीजे लाने की बात दोहरा रहे हैं.
निशांत कुमार की एंट्री
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब निशांत कुमार ने चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथों में ले ली. वे नालंदा, पटना और आसपास के इलाकों में जाकर एनडीए के प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बना रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक इसे जेडीयू में निशांत की राजनीतिक स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता के पहले बड़े लिटमस टेस्ट के रूप में देख रहे हैं. अगर निशांत के मैदान में उतरने और लगातार प्रचार करने के बावजूद जेडीयू यह सीट हार जाती है, तो इसका सीधा असर नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रभाव और उनकी भावी विरासत पर पड़ना तय माना जा रहा है.
नीरज कुमार का पलटवार
चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए जेडीयू प्रत्याशी नीरज कुमार भी अपने पुराने और आक्रामक अंदाज में नजर आ रहे हैं. उन्होंने मंच से अनंत सिंह का नाम लिए बिना अतीत की घटनाओं और आपराधिक मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि वे नीतीश कुमार के सच्चे सिपाही और निशांत कुमार के सहयोगी हैं. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि भले ही उनके पास किसी की तरह अकूत धनबल न हो, लेकिन कार्यकर्ता ही उनकी असली ताकत हैं और जनता सब जानती है कि कौन सही है और कौन गलत.
अगर नीरज हारे तो हार किसकी: JDU या नीतीश कुमार?
इस चुनाव के नतीजे बिहार की राजनीति पर दूरगामी असर डालने वाले हैं. पटना स्नातक सीट पर जेडीयू लगातार तीन बार से जीत हासिल करती आ रही है. ऐसे में अगर इस बार जेडीयू प्रत्याशी की हार होती है और जन सुराज समर्थित प्रत्याशी चुनाव जीत जाता है, तो इसे सिर्फ नीरज कुमार की हार नहीं माना जाएगा. यह सीधे तौर पर नीतीश कुमार के गढ़ में सेंधमारी और उनके प्रभाव में कमी के रूप में देखा जाएगा. इसके साथ ही यह घटनाक्रम यह भी साबित कर देगा कि जेडीयू के सांगठनिक ढांचे पर अनंत सिंह का व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय समीकरण भारी पड़ गए.
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