बिहार की राजनीति में अमूमन हर मुद्दे को जातीय रंग में रंगे देखा जाता है, लेकिन भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने राज्य की सियासत में एक अभूतपूर्व बदलाव ला दिया है. बिहार की पारंपरिक और ध्रुवीकृत जातिगत राजनीति के विपरीत, इस एनकाउंटर के बाद पहली बार अगड़ी और पिछड़ी जातियां एक सुर में इंसाफ की मांग करती नजर आ रही हैं. इस सामाजिक लामबंदी के कारण मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पार्टी के भीतर और बाहर, दोनों तरफ से भारी राजनीतिक दबाव महसूस कर रहे हैं. बिहार की कानून व्यवस्था के साथ-साथ इस खास एनकाउंटर पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसने राज्य की सत्ता को चौतरफा घेर लिया है.
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अगड़ी जातियों में खुलकर सामने आई नाराजगी
भरत तिवारी के एनकाउंटर के बाद से पैदा हुई नाराजगी सिर्फ ब्राह्मण समाज तक सीमित नहीं रही है, बल्कि समूचे सवर्ण समाज में इसके खिलाफ तीखा आक्रोश देखा जा रहा है. इस मामले में ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ समाज के लोग एकजुट होकर इस पुलिसिया कार्रवाई का खुलकर विरोध कर रहे हैं. उनका साफ तौर पर कहना है कि जो कुछ भी हुआ है, वह पूरी तरह गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए था. हद तो यह है कि एनडीए सरकार में शामिल अगड़ी जाति के कई बड़े नेता और मंत्री भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठा चुके हैं, जिसके बाद अब इस पूरे मामले की न्यायिक जांच भी शुरू कर दी गई है.
सवर्णों के साथ खड़ा हुआ यादव समाज
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू यह है कि अगड़ी जातियों के इस विरोध प्रदर्शन को पिछड़ी जातियों, विशेषकर यादव समाज का भी पूरा साथ मिल रहा है. दरअसल, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही अपराधियों के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई की जा रही है, जो कि काफी हद तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 'एक्शन स्टाइल' से मिलती-जुलती है. बीते दो महीनों में बिहार के भीतर तकरीबन दो दर्जन से अधिक एनकाउंटर (फुल और हाफ एनकाउंटर) किए जा चुके हैं.
भरत तिवारी एनकाउंटर से पहले हुए इन मामलों में बड़ी संख्या में यादव समाज के लोग पुलिसिया कार्रवाई का शिकार हुए थे, जिसके कारण राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव और पूरे यादव समाज में पहले से ही भारी नाराजगी थी. राजद नेताओं का यह संगीन आरोप था कि बिहार सरकार जाति पूछकर एनकाउंटर कर रही है. अब भरत तिवारी के एनकाउंटर के बाद यादव समाज को भी अपनी बात मजबूती से रखने का मौका मिल गया है और वे इस मुद्दे पर सवर्णों के साथ खड़े हो गए हैं.
पार्टी लाइन से ऊपर उठकर मंत्रियों ने भी उठाए सवाल
इस विवाद की आंच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बेहद करीबी मंत्रियों और सहयोगियों तक पहुंच चुकी है. भूमिहार समाज से आने वाले मंत्री विजय सिन्हा, ब्राह्मण समाज के मिथिलेश तिवारी और कायस्थ समाज के ऋतुराज सिन्हा जैसे दिग्गज नेता इस एनकाउंटर को लेकर अपनी ही सरकार की कार्रवाई पर सवालिया निशान लगा रहे हैं. इत
ना ही नहीं, पिछड़ी जातियों और दलित समाज के बड़े चेहरे भी इस मोर्चे पर एकजुट हैं. पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी और कुर्मी समाज के बड़े नेता मंत्री श्रवण कुमार और दलित समाज से आने वाले मंत्री अशोक चौधरी ने भी इस एनकाउंटर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं. इस तरह अगड़ी और पिछड़ी जातियों के प्रमुख नेताओं की एकजुटता ने मुख्यमंत्री के लिए सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बड़ी घेराबंदी कर दी है.
मुंगेर की सभा से सम्राट चौधरी का बेफिक्र अंदाज
तमाम राजनीतिक और सामाजिक दबावों और चारों तरफ से हो रही घेराबंदी के बावजूद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपने फैसलों पर पूरी तरह अडिग हैं. मुंगेर में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने साफ और स्पष्ट शब्दों में संदेश दे दिया कि अपराधियों के खिलाफ शुरू की गई उनकी मुहिम किसी भी कीमत पर रुकने वाली नहीं है. मुख्यमंत्री ने कड़े लहजे में कहा कि बिहार में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है और उन्हें भागकर नेपाल जाना ही पड़ेगा.
इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चिरपरिचित अंदाज में जनता से सीधा संवाद किया और मंच से पूछा कि क्या अपराधियों पर लगाम नहीं लगनी चाहिए? क्या उनके खिलाफ सख्त एक्शन नहीं होना चाहिए? मुंगेर की जनता से एक तरह का जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराते हुए सम्राट चौधरी ने साफ कर दिया कि वे इस विरोध से बेफिक्र हैं और कानून-व्यवस्था को लेकर टस से मस नहीं होने वाले हैं.
सम्राट चौधरी के लिए भविष्य की बड़ी चुनौती
बिहार जैसे संवेदनशील राज्य में जहां हर चुनावी और सामाजिक समीकरण जाति के इर्द-गिर्द घूमता है, वहां अगड़े और पिछड़ों का इस तरह एक मंच पर आना मामूली बात नहीं है. सम्राट चौधरी ने अभी हाल ही में मुख्यमंत्री का पद संभाला है और उन्हें अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा करना है. ऐसे में यह सवाल तेजी से हवा पकड़ रहा है कि यदि न्याय के नाम पर अगड़ी और पिछड़ी जातियां लंबे समय तक इस मुद्दे पर एकजुट बनी रहीं, तो क्या यह नई नवेली सरकार के लिए एक बड़ा वार्निंग सिग्नल साबित हो सकता है. फिलहाल इस एनकाउंटर की न्यायिक जांच जारी है, लेकिन इसने बिहार की सियासत की दशा और दिशा को जरूर बदल कर रख दिया है.
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आखिर किसकी गोली लगने से हुई थी भरत तिवारी की मौत? अब जल्द ही सुलझेगी एनकाउंटर की सबसे बड़ी गुत्थी
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