Bankipur Byelection: प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव ही क्यों चुना? जानिए उनके इस फैसले के पीछे छिपी रणनीति

इन्द्र मोहन

• 03:30 PM • 12 Jul 2026

Bankipur By Election: बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की एंट्री ने बिहार की राजनीति को नई दिशा दे दी है. आखिर उन्होंने यही सीट क्यों चुनी, किस वोट बैंक पर उनकी नजर है और क्या यह चुनाव बीजेपी-आरजेडी के स्थापित समीकरणों को बदल सकता है? विस्तार से समझिए उनकी पूरी रणनीति.

बांकीपुर से चुनाव लड़ने के पीछे प्रशांत किशोर की क्या है खास रणनीति?
बांकीपुर से चुनाव लड़ने के पीछे प्रशांत किशोर की क्या है खास रणनीति?
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बिहार की सियासत में इन दिनों बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव सबसे बड़ा हॉट टॉपिक बना हुआ है. पूरे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जिस प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी को लेकर सिर्फ कयास लगते रहे, उन्होंने आखिरकार बांकीपुर से खुद चुनावी मैदान में उतरने का फैसला कर लिया. कभी करगहर तो कभी राघवपुर सीट की चर्चाओं के बीच अचानक प्रशांत किशोर का बांकीपुर को चुनना हर किसी को हैरान कर रहा है. दरअसल, बीजेपी के नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई है.यहां हां 30 जुलाई को वोटिंग होनी है. वहीं 3 अगस्त को नतीजे सामने आएंगे.

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दिग्गजों की साख दांव पर और प्रशांत किशोर का एंट्री फैक्टर

बांकीपुर का यह मुकाबला बेहद कड़ा और बहुकोणीय हो चुका है. इस सीट पर बीजेपी की तरफ से नीरज कुमार सिन्हा मैदान में हैं, तो वहीं आरजेडी ने एक बार फिर रेखा गुप्ता पर दांव खेला है. इसके अलावा तेज प्रताप यादव की पार्टी जेजेडी से वीना मानवी भी ताल ठोक रही हैं. कई निर्दलीय और अन्य दलों के प्रत्याशी भी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन पूरी लाइमलाइट प्रशांत किशोर ने बटोर रखी है. बिहार चुनाव में एक भी सीट न जीतने के बावजूद चर्चा में रहने वाली जन सुराज पार्टी के लिए यह चुनाव साख का सवाल बन गया है, क्योंकि इस बार खुद प्रशांत किशोर दांव पर लगे हैं.

उन पैंतालीस लाख में से पौने दो लाख शांत वोटरों पर नजर

प्रशांत किशोर के बांकीपुर चुनने के पीछे एक बहुत ही सोची-समझी रणनीतिक वजह है. बांकीपुर मूल रूप से एक शहरी विधानसभा सीट है, जहां पारंपरिक रूप से वोटिंग का प्रतिशत काफी कम रहता है. पिछले चुनाव में यहां सिर्फ 41.35 प्रतिशत मतदान हुआ था, जिसमें बीजेपी के नितिन नवीन को करीब 62 फीसदी (98,299) वोट मिले थे और आरजेडी की रेखा गुप्ता को 29 फीसदी (46,363) वोट मिले थे. प्रशांत किशोर की नजर सीधे तौर पर उन 1,75,000 वोटरों पर है, जो न तो बीजेपी को वोट देते हैं और न ही आरजेडी को, बल्कि वे चुनाव के दिन घर से बाहर ही नहीं निकलते. अगर प्रशांत किशोर इन खामोश मतदाताओं को बूथ तक लाने में कामयाब रहे, तो यहां एक बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिल सकता है.

सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं को साधने का समीकरण

बांकीपुर सीट का सामाजिक समीकरण भी काफी दिलचस्प है. यह सीट सवर्ण बहुल मानी जाती है, जिसमें कायस्थ मतदाताओं का अच्छा-खासा बोलबाला है. इसी समीकरण के दम पर नितिन नवीन और उनके पिता 1995 से लगातार यहां जीत दर्ज करते आ रहे हैं. खुद सवर्ण समाज से आने वाले प्रशांत किशोर की कोशिश इस पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की है. इसके साथ ही, उनकी नजर यहां के 10 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं पर भी है. अगर जन सुराज इन दोनों वर्गों का भरोसा जीतने में सफल रहती है, तो आरजेडी और बीजेपी दोनों के समीकरण बिगड़ सकते हैं. हालांकि, आरजेडी की रेखा गुप्ता पिछली बार हार के बावजूद 46 हजार से ज्यादा वोट लाई थीं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है.

एक सीट पर पूरी पार्टी की ताकत झोंकने का मौका

उपचुनाव को चुनने की एक बड़ी व्यावहारिक वजह यह भी है कि आम चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर को सभी 243 सीटों पर प्रचार की कमान संभालनी थी. लेकिन इस बार चुनाव सिर्फ एक सीट पर हो रहा है. ऐसे में जन सुराज के सभी कार्यकर्ता और आम चुनाव लड़ने वाले सभी 243 पूर्व उम्मीदवार अब अकेले बांकीपुर में प्रशांत किशोर के लिए जी-जान से कैंपेन कर रहे हैं. इसके अलावा, नीट पेपर लीक, नीट छात्राओं से जुड़े विषय और भरत तिवारी एनकाउंटर जैसे बिहार के समसामयिक मुद्दों पर प्रशांत किशोर लगातार मुखर रहे हैं, जिसका फायदा उन्हें इस शहरी क्षेत्र में मिलने की उम्मीद है.

दिल्ली तक संदेश भेजने का क्या है मास्टरप्लान?

प्रशांत किशोर इस सीट को जीतकर पूरे देश में यह संदेश देना चाहते हैं कि बीजेपी को उसके सबसे मजबूत गढ़ में भी मात दी जा सकती है. हाल ही में बीजेपी नेतृत्व द्वारा लिए गए कुछ फैसलों को लेकर वे जनता के बीच जा रहे हैं. उनका कहना है कि बिहार के लोगों के पास दिल्ली तक अपनी बात पहुंचाने का यह सबसे सीधा जरिया है. बीजेपी के कथित अहंकार और स्थानीय नेताओं के फैसलों के खिलाफ ईवीएम का बटन दबाना एक हॉटलाइन की तरह काम करेगा. अब देखना यह होगा कि 30 जुलाई को बांकीपुर की जनता घरों से निकलकर जन सुराज का साथ देती है या फिर बीजेपी अपने इस पुराने किले को बचाने में कामयाब रहती है. इसका फैसला 3 अगस्त को ही होगा.
 

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