बिहार की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है. सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार के कैबिनेट विस्तार की तारीख अब साफ हो गई है. आगामी 7 मई को गांधी मैदान में शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. इस विस्तार में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के बीच मंत्रियों की संख्या का फॉर्मूला लगभग तय माना जा रहा है. चर्चा है कि भाजपा कोटे से 12, जेडीयू से 11, चिराग पासवान की पार्टी LJPR से 2, और HAM व RLM से 1-1 मंत्री शपथ ले सकते हैं. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच सबसे बड़ा सवाल विजय सिन्हा की भूमिका और उनके मंत्रालय को लेकर बना हुआ है. आइए विस्तार से जानते हैं पूरी बात.
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विजय सिन्हा के भविष्य पर सस्पेंस
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पिछली सरकार में सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा दोनों ही उपमुख्यमंत्री के पद पर थे और दोनों का राजनीतिक कद बराबर माना जा रहा था. हालांकि, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने और गृह मंत्रालय अपने पास रखने के बाद विजय सिन्हा के पोर्टफोलियो को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है. राजनीतिक गलियारों में इसे विजय सिन्हा के डिमोशन के तौर पर भी देखा जा रहा है. पिछले कुछ समय से विजय सिन्हा दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की है. माना जा रहा है कि वह कैबिनेट में शामिल होने के साथ-साथ एक मजबूत मंत्रालय के लिए दबाव बना रहे हैं.
गृह मंत्रालय और राजस्व विभाग की रेस से बाहर?
शुरुआत में चर्चा थी कि विजय सिन्हा को गृह मंत्रालय दिया जा सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गृह विभाग मुख्यमंत्री के पास ही रहेगा. इसके अलावा, विजय सिन्हा के पुराने विभाग भूमि एवं राजस्व को लेकर भी पेंच फंसा हुआ है. बताया जा रहा है कि इस विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान अधिकारियों और कर्मचारियों की हड़ताल के कारण कामकाज काफी प्रभावित हुआ था, जिससे सरकार की किरकिरी हुई थी. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि यह विभाग भी उनके हाथ से निकल सकता है और उन्हें नितिन नवीन के पास रहे पुराने विभागों या किसी अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जा सकती है.
तेजस्वी यादव का तंज और सवर्ण राजनीति का समीकरण
विधानसभा के विश्वास मत के दौरान तेजस्वी यादव ने सम्राट चौधरी की पगड़ी का जिक्र करते हुए विजय सिन्हा पर तंज कसा था कि उनकी नजर उस पर बनी हुई है. तेजस्वी के इस कटाक्ष को भले ही उस समय हल्के में लिया गया हो, लेकिन सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय सिन्हा के मन में दबी ठेस उनके भाषणों में झलकती रही है. भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सवर्णों, विशेषकर भूमिहार समाज की नाराजगी को दूर करना है. हालांकि मंगल पांडे की खाली सीट पर भूमिहार उम्मीदवार को भेजकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की गई है, लेकिन विजय सिन्हा को मिलने वाला पोर्टफोलियो ही यह तय करेगा कि भाजपा अपने इस कोर वोट बैंक को कितना संतुष्ट कर पाती है.
क्या होंगे विजय सिन्हा के पास दो मंत्रालय?
सूत्रों और राजनीतिक जानकारों की मानें तो विजय सिन्हा को कैबिनेट में सम्मानजनक स्थान देने के लिए उन्हें एक के बजाय दो मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी जा सकती है. भाजपा आलाकमान यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विजय सिन्हा प्रकरण को इस तरह हैंडल किया जाए जिससे पार्टी के भीतर और बाहर कोई नकारात्मक संदेश न जाए. अब सबकी नजरें 7 मई की शपथ ग्रहण पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि सम्राट चौधरी की टीम में विजय सिन्हा किस हैसियत और किस विभाग के साथ नजर आएंगे.
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