बिहार में वर्ष 2016 से लागू शराबबंदी कानून एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है. हाल ही में आई एक सिफारिश के बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या राज्य में शराबबंदी कानून को समाप्त कर दिया जाएगा या इसमें कुछ ढील दी जाएगी. शराबबंदी के फैसले को लेकर शुरुआत से ही राज्य में पक्ष और विपक्ष के बीच बहस जारी रही है. जहां एक ओर इसे सामाजिक सुधार और महिलाओं के हित में उठाया गया कदम माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके आर्थिक नुकसान और जमीनी हकीकत को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं.
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शराबबंदी से आर्थिक नुकसान और ब्लैक मनी का फैलता नेटवर्क
राज्य में शराबबंदी लागू होने के बाद से सरकार को मिलने वाले आबकारी राजस्व में भारी गिरावट दर्ज की गई है. आबकारी टैक्स किसी भी राज्य के विकास कार्यों और बजट प्रबंधन में एक बड़ी भूमिका निभाता है. शराबबंदी के कारण सरकार को हर साल करोड़ों रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान हो रहा है. इसके अलावा, शराबबंदी के बावजूद राज्य में शराब की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हो सकी है, बल्कि एक समानांतर 'ब्लैक मार्केट' का तंत्र विकसित हो चुका है. लोग दोगुने से चौगुने दामों पर नकद में शराब खरीद रहे हैं. इससे सारा पैसा सरकार के खजाने में जाने के बजाय अवैध शराब माफियाओं और ब्लैक मनी नेटवर्क के पास जमा हो रहा है.
विकास योजनाओं और बजट पर असर का दावा
राजस्व की इस भारी कमी का सीधा असर राज्य के विकास कार्यों और सार्वजनिक खर्चों पर दिखाई दे रहा है. विपक्ष के नेताओं, विशेषकर तेजस्वी यादव के दावों के अनुसार, राज्य सरकार के पास पैसों की भारी किल्लत हो गई है. इसके चलते कई जगहों पर शिक्षकों के वेतन, पेंशनभोगियों की पेंशन और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई महत्वपूर्ण विकास योजनाएं अटकी हुई हैं या उनमें देरी हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियंत्रित तरीके से पाबंदियों के साथ शराब की बिक्री की अनुमति दी जाती, तो राज्य सरकार का राजस्व बीते 8-10 वर्षों में कई गुना बढ़ सकता था.
महिलाओं की मांग और घरेलू हिंसा में आई कमी
दूसरी तरफ, शराबबंदी लागू करने के पीछे नीतीश सरकार की सबसे बड़ी वजह महिलाओं की लगातार की जा रही मांग और घरेलू हिंसा पर अंकुश लगाना था. 2016 में जब यह कानून लागू किया गया, तब राज्य में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में भारी कमी दर्ज की गई थी. राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस फैसले ने सत्तारूढ़ एनडीए और जेडीयू को बड़ा फायदा पहुंचाया, जिससे महिला मतदाताओं का करीब 50 फीसदी समर्थन उनके पाले में आया. यही कारण है कि सरकार इस फैसले को वापस लेने में अत्यधिक सतर्कता बरत रही है, क्योंकि शराबबंदी हटाने से घरेलू हिंसा के आंकड़े दोबारा बढ़ने का जोखिम हो सकता है.
सरकार का रुख और सम्राट चौधरी का रुख साफ
शराबबंदी हटाने की सिफारिश के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस फैसले को बदलने का रुख अपनाएगी. हालांकि, सम्राट चौधरी ने शुरुआती बयानों में ही स्थिति को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में शराबबंदी कानून को नहीं हटाया जाएगा. सरकार का मानना है कि महिलाओं के हित और सामाजिक सुरक्षा सर्वोपरि हैं और इस कानून को फिलहाल जारी रखा जाएगा.
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