बिहार की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय मोड़ पर आ पहुंची है, जहां मुख्य रूप से बीजेपी, जेडीयू और विपक्षी दल आरजेडी आमने-सामने हैं. पिछले 72 घंटों के दौरान आरजेडी की ओर से दिए गए ऑफर्स और उस पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के बयानों को देखें तो यह स्पष्ट रूप से एक सियासी माइंड गेम नजर आता है. इस रणनीति के तहत जेडीयू को ऐसी स्थिति में धकेला जा रहा है कि अगर वह बात मानती है तब भी फायदा, और अगर नहीं मानती है तब भी इस माइंड गेम में आरजेडी की जीत तय मानी जा रही है.
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यूसीसी (UCC) के मुद्दे पर जेडीयू का रुख और आरजेडी की नजर
समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने को लेकर जब से बीजेपी ने अपनी मंशा जाहिर की है, तभी से जेडीयू ने भी इस पर अपना पक्ष रखना शुरू कर दिया है. जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर इसके प्रावधानों को समझने की बात कर रहे हैं. इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि जेडीयू ने साल 2017 में ही नीतीश कुमार के एक पत्र के जरिए यह साफ कर दिया था कि इस मामले में सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करना बेहद जरूरी है. आरजेडी को लगता है कि यूसीसी के मुद्दे पर जेडीयू और बीजेपी के बीच तल्खी बढ़ सकती है, क्योंकि नीतीश कुमार कभी नहीं चाहेंगे कि बिहार जैसे राज्य में जाति और धर्म के नाम पर किसी प्रकार का तनाव पैदा हो.
एनडीए के भीतर समीकरण और आरजेडी का खुला ऑफर
वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से देखें तो जेडीयू के पास विधानसभा में 85 विधायक हैं, जिनकी ताकत एनडीए सरकार के लिए बहुत मायने रखती है. यदि जेडीयू का रुख बदलता है तो सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, लेकिन बीजेपी भी यह अच्छी तरह जानती है कि जेडीयू के साथ राज्य और केंद्र दोनों ही स्तर पर संबंध बिगाड़ना उनके लिए आसान नहीं होगा. इसी का फायदा उठाते हुए आरजेडी विधायक भाई वीरेंद्र ने जेडीयू को सीधे तौर पर महागठबंधन में शामिल होने का ऑफर दे दिया है और उन्हें यूसीसी के मुद्दे पर बीजेपी से अलग होने की नसीहत दी है.
तेजस्वी यादव की सोची-समझी रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम के बीच तेजस्वी यादव सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधने से बचते नजर आ रहे हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह समझते हैं कि इस मामले में बचाव का मुख्य चेहरा नीतीश कुमार ही हैं. इसके बजाय, तेजस्वी जेडीयू के अन्य नेताओं और संजय झा की मुलाकातों पर तीखा प्रहार कर रहे हैं. आरजेडी की मुख्य कोशिश बीजेपी और जेडीयू के बीच की दूरियों को बढ़ाने की है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि जेडीयू अल्पसंख्यकों के हितों के साथ खड़ी नहीं है. अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या आरजेडी का यह माइंड गेम कामयाब होता है और क्या जेडीयू इस सियासी जाल में फंसकर कोई बड़ा उलटफेर करती है.
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